SALIM RAZA REWA

SALIM RAZA REWA

@salimraza1975

SALIM RAZA REWA shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in SALIM RAZA REWA's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जी भर के मुझ को नाच नचा ले तू ज़िंदगी मैं ने भी घुँघरू बाँध लिए अपने पाँव में — SALIM RAZA REWA
वो जिसे चाहे अता कर दे ज़माने की ख़ुशी उस के ही हाथों में हैं सारे जहाँ की नेमतें — SALIM RAZA REWA
लगेंगे तेरे काँधे पर सितारे कामयाबी के मगर तुझ को सफ़र में भीड़ से आगे निकलना है — SALIM RAZA REWA
एक दिन ख़्वाब में वो क्या आए घर मेरा आज तक महकता है — SALIM RAZA REWA
अच्छा किया जो छोड़ दिया साथ हमारा कब तक सॅंभालते ये दिल-ए-बेक़रार को — SALIM RAZA REWA

Ghazal

हुस्न जब ज़ेवर-ए-उल्फ़त से सँवर जाता है नूर बनकर वो दिल-ओ-जाँ में उतर जाता है दिल किसी और के पीछे नहीं चलता हरगिज़ दिल उधर जाता है महबूब जिधर जाता है चोट खाता है मोहब्बत में किसी का जब दिल इश्क़ का भूत तो दो दिन में उतर जाता है आज भी उस को मोहब्बत है यक़ीनन मुझ सेे जब भी मिलता है वो पल भर को ठहर जाता है वो थिरकता है लहू बनके मेरी नस-नस में और फिर मेरे ख़यालों में बिखर जाता है लब पे हल्का सा तबस्सुम भी अगर आ जाए हुस्न फिर उस का बहारों सा निखर जाता है ऐसे इंसाँ पे रज़ा कैसे भरोसा कर लें कर के वा'दा जो हमेशा ही मुकर जाता है — SALIM RAZA REWA
सच का साथ भला कैसे दे पाएगा एहसानों के बोझ से गर दब जाएगा जब सच का आईना शोर मचाएगा शर्म से तू पानी-पानी हो जाएगा सारी दुनिया में थू-थू हो जाएगी जिस दिन तेरा झूठ पकड़ में आएगा मेरे पाँव के छाले मुझ सेे कहते है कब तक उस की खोज में चलता जाएगा उस दिन मेरी तन्हाई जी उट्ठेगी जिस दिन तू मेरी धड़कन बन जाएगा जैसा हम बोएँगे वैसा काटेंगे कर्मों का फल तो हर कोई पाएगा उस के सारे ग़म धुँदले पड़ जाएँगे जिस को मुश्किल में जीना आ जाएगा मुझ को काँटों पर भी चलना आता है इन रस्तों पर क्या तू भी चल पाएगा क्यूँँ दौलत पे लोग 'रज़ा' इतराते हैं इक दिन सब कुछ मिट्टी में मिल जाएगा — SALIM RAZA REWA
कितना बे-रंग ये ज़माना है आसमानों में घर बनाना है मैं ज़मीनों से उठ गया कब का अब फ़लक मेरा आशियाना है तेरी उल्फ़त की ओढ़ कर चादर सारी दुनिया से दूर जाना है कोई ख़्वाहिश नहीं न कोई ग़म अपना अंदाज़ सूफ़ियाना है मुश्किलों से निबाह कर लूँगा साथ तुझ को मगर निभाना है ग़म फ़क़त ही नहीं है दामन में चंद ख़ुशियों का भी ख़ज़ाना है मुझ को ख़्वाहिश है उस सेे मिलने की उस के होंटों पे बस बहाना है एक दिन ख़्वाब में ही आ जाओ तुम को फिर से गले लगाना है दिल ये कहता है तुम चले आओ आज मौसम बड़ा सुहाना है ज़ख़्म-ए-उल्फ़त सँभाले क्यूँ न 'रज़ा' अपने जीने का ये बहाना है — SALIM RAZA REWA
इब्तिदा तुझी से है इंतिहा तुझी से है ये निज़ाम दुनिया का ऐ ख़ुदा तुझी से है जिन्न-ओ-हूर बहरो-बर सब तेरे करिश्में हैं इस जहान-ए-फ़ानी में जो बना तुझी से है कौन है सिवा तेरे भर दे जो मेरा दामन तू ही तो सहारा है आसरा तुझी से है क्यूँँ किसी के गुन गाऊँ क्यूँँ किसी के दर जाऊँ सब को तू ही देता है जो मिला तुझी से है पल में तू बना देता पल में तू मिटा देता ये बहार तुझ सेे है ज़लज़ला तुझी से है तू गिरफ़्त में ले ले या कि छोड़ दे मौला ज़िन्दगी के लम्हों का फ़ैसला तुझी से है क्या बिसात है मेरी बिन करम तेरे दाता शा'इरी की दुनिया में ये रज़ा तुझी से है — SALIM RAZA REWA
ग़मों की गर्द ने ढक ली है हर ख़ुशी मेरी सिसक-सिसक के गुज़रती है ज़िंदगी मेरी मैं मुस्कुरा भी दिया टूट कर बिखर भी गया उसे पता ही नहीं है ये सादगी मेरी मैं अपने ग़म को छुपा लूँगा इस हुनर के साथ नज़र न आएगी दुनिया को बेबसी मेरी बहार आई तो शाख़ों से फूल झड़ने लगे है मुझ को डर मुझे खाए न ताज़गी मेरी जो अश्क बन के छलकती रही निगाहों से उसी को लोग समझते रहे ख़ुशी मेरी ग़मों के शोर से दहला है ऐसा दिल मेरा डरी-डरी सी रहा करती है ख़ुशी मेरी रज़ा यही तो मुक़द्दर की मेहरबानी है हुई न ख़त्म ये तकलीफ़-ए-आशिक़ी मेरी — SALIM RAZA REWA
तुझ को डाँटूँ या तुझे प्यार करूँँ मैं पहले कौन से जज़्बे का इज़हार करूँँ मैं पहले हर ग़लत काम की तर्ग़ीब दिलाऊँ तुझ को या'नी ख़ुद को ही गुनहगार करूँँ मैं पहले ज़ख़्म सिलने में कई ज़ख़्म दिए टाँकों ने कौन से दर्द का इज़हार करूँँ मैं पहले चोट खाया है मेरे जिस्म का हर इक हिस्सा कौन से हिस्से का उपचार करूँँ मैं पहले चेहरा हो उन का हमेशा ही निगाहों के क़रीब आँख जब भी खुले दीदार करूँँ मैं पहले उस की ख़ामोश निगाहों ने जो बातें की हैं दिल ये कहता है वो इज़हार करूँँ मैं पहले फिर तो मुमकिन ही नहीं है कोई झगड़ा प्यारे तू अगर चाहता है वार करूँँ मैं पहले मेरा महबूब ही तकलीफ़ का सामाँ है 'रज़ा' उस को समझाऊँ या तकरार करूँँ मैं पहले — SALIM RAZA REWA
दिल में ख़्वाहिश है तैबा नगर जाएँगे उन की चौखट पे रखने को सर जाएँगे लौट कर हम न आएँगे वापस कभी हुक्म-ए-रब से मदीना अगर जाएँगे दर पे आक़ा मुझे भी बुला लीजिए इश्क़ में वर्ना घुट घुट के मर जाएँगे उन की आमद की जिस दम सुनेंगे ख़बर राह में फूल बन के बिखर जाएँगे जिनपे आक़ा की हो जाए नज़रें करम उन के दामन मुरादों से भर जाएँगे ये बता दीजिए हो के मायूस हम छोड़ कर आप का दर किधर जाएँगे हो गया जिन के ऊपर करम आप का उन के बिगड़े मुक़द्दर सँवर जाएँगे बे-ख़तर पुल सिराते जहन्नुम से भी जो गुलाम-ए-नबी हैं गुज़र जाएँगे आज मौक़ा' है तू भी रज़ा माँग ले काम बिगड़े तेरे सब सँवर जाएँगे — SALIM RAZA REWA
ये दिल बेचैन होता है कलेजा काँप जाता है वो मंज़र कर्बला का जिस घड़ी भी याद आता है गले में चुभ गया फ़ौज-ए-लईं का तीर बेकस पे तड़पता प्यास से मासूम असगर याद आता है कहीं शमशीर की धारे कहीं पे ख़ूॅं की बौछारें वो चीख़ों का समाँ रोना तड़पना याद आता है ये थी ईमान की क़ुव्वत ये दिल में रब की चाहत थी नबी का लाडला सजदे में अपना सर कटाता है हुसैन इब्न-ए-अली का ही जिगर था ऐ जहाँ वालों कोई दुनिया में है जो इस तरह वा'दा निभाता है ज़माना काँप जाता है 'रज़ा' उस ख़ूनी मंज़र से जो सुनता दास्तान-ए-कर्बला आँसू बहाता है — SALIM RAZA REWA

Nazm

“बेटी बचाइए” बेटी से ये जहान है बेटी बचाइए माँ बाप की ये जान है बेटी बचाइए ये सारी काइनात बदौलत इसी से है सारे जहाँ में फैली मोहब्बत इसी से है बेटी चमेली बनके चमन में महक रही बातों से यूँँ लगे है कि बुलबुल चहक रही बेटी से ख़ानदान है बेटी बचाइए बेटी कहीं पे माँ कही बहना के रूप में पत्नी बहु ये बनके निकलती है धूप में हर काम में हैं हाथ बटातीं ये बेटियाँ हर रूप में हैं प्यार लुटातीं ये बेटियाँ ये घर की आन बान है बेटी बचाइए बेटी को मारिए न बहू को जलाइए बेटी बहन किसी कि हो इज़्ज़त बचाइए बनकर दुल्हन जो आई तो ख़ुशियाँ भी लाएगी माँ बन के एक रोज़ ये ममता लुटाएगी ये दो कुलों की शान है बेटी बचाइए — SALIM RAZA REWA
"कहीं और चल" मेरे दिल कहीं और चल ज़माने में तेरा ठिकाना नहीं वफ़ा तू करेगा मिलेगी जफ़ाएँ ज़माने की ऐसी लगी बद्दुआएँ नज़र तू उठा कर के जी न सकेगा जुदाई का तू ज़हर पी न सकेगा मेरे दिल न इतना मचल कि रो रो के जाँ को गँवाना नहीं तुझे तेरे अपने ही छलने लगे हैं तेरे सारे सपने बिखरने लगे हैं अरे बेख़बर इतना हैरान क्यूँँ है ज़माने से इतना परेशान क्यूँँ है मेरे दिल तू ख़ुद को बदल तड़प कर के दिल को जलाना नहीं तेरे प्यार ने तुझ को धोका दिया है सुना है कोई उन का साथी नया है मगर तेरे बिन कैसे ख़ुश वो रहेंगे तेरी याद आई तो तड़पा करेंगे मेरे दिल अब तो सँभल जफ़ाओं को उन के भुलाना नहीं — SALIM RAZA REWA
वतन ये हमारा ज़मीं ये हमारी वतन ये हमारा उजड़ने न देंगे चमन ये हमारा वतन के लिए जो मेरी जान जाए ख़ुदारा यहीं फिर जनम लें दुबारा जो सरहद पे अपने सरों को कटा कर अमर हो गए जो वतन को बचाकर वो ख़ुशबू के जैसे महकते रहेंगे चमकते रहेंगे वो बनकर सितारा भगत बोस सुखदेव बलिदानियों को न भूलेंगे हम उन की क़ुर्बानियों को वो फाँसी में भी चढ़ गए हँसते हँसते वतन के लिए हर सितम था गवारा तुम्हें याद करते हैं ये चाँद-तारे तुम्हें सरहदों की है मिट्टी पुकारे चराग़-ए-मोहब्बत जलाते रहेंगे न टूटेगा रिश्ता हमारा तुम्हारा न मज़हब सिखाता है तकरार बाँटो अगर बाँटना हो सदा प्यार बाँटो रज़ा हो अमन सारी दुनिया में क़ाएम ज़माने में हो हर तरफ़ भाई चारा — SALIM RAZA REWA
ईमान की शम्अ' ऐ मेरे दोस्त मोहब्बत को बचाए रखना दिल में ईमान कि शम्ओं को जलाए रखना इस नए साल में ख़ुशियों का चमन खिल जाए सब को मनचाही मुरादों का सिला मिल जाए इस नए साल में ख़ुशियों की हो बारिश घर घर इस नए साल को ख़ुश-रंग बनाए रखना जान पुरखों ने लुटाई है वतन की ख़ातिर गोलियाँ सीने में खाई है वतन की ख़ातिर सारे धर्मों से ही ताक़त है वतन की मेरे सारे धर्मों की मोहब्बत को बनाए रखना ज़ात के नाम पे दंगों को कराने वालो बाज़ आ जाओ मोहब्बत को मिटाने वालो धर्म के नाम पे यूँँ आग लगाने वालो ख़ुद के दामन को भी जलने से बचाए रखना क्यूँँ मिटाने में लगे हो ये चमन की ख़ुशबू ख़ून से सींचा तो पाई है वतन की ख़ुशबू हर तरफ़ जलने लगा है ये वतन का आँचल लाज इस माँ की मेरे यार बचाए रखना सारी दुनिया में मोहब्बत की ज़बाँ हो जाए सारी दुनिया में ख़ुशी अम्न-ओ-अमाँ हो जाए भूल कर भी न कोई भूल हो हरगिज़ मुझ सेे मुझ पे भी नज़्र-ए-करम अपनी बनाए रखना दिल से नफ़रत की मिनारों को गिराना होगा दोस्त बनकर के गले सब को लगाना होगा जिन की ख़ुशबू से महक जाए वतन का आँगन ऐसे फूलों को भी गुलशन में लगाए रखना — SALIM RAZA REWA