तुझ को डाँटूँ या तुझे प्यार करूँँ मैं पहले

कौन से जज़्बे का इज़हार करूँ मैं पहले

हर ग़लत काम की तर्ग़ीब दिलाऊँ तुझ को
या'नी ख़ुद को ही गुनहगार करूँ मैं पहले

ज़ख़्म सिलने में कई ज़ख़्म दिए टाँकों ने
कौन से दर्द का इज़हार करूँ मैं पहले

चोट खाया है मेरे जिस्म का हर इक हिस्सा
कौन से हिस्से का उपचार करूँ मैं पहले

चेहरा हो उन का हमेशा ही निगाहों के क़रीब
आँख जब भी खुले दीदार करूँ मैं पहले

उस की ख़ामोश निगाहों ने जो बातें की हैं
दिल ये कहता है वो इज़हार करूँ मैं पहले

फिर तो मुमकिन ही नहीं है कोई झगड़ा प्यारे
तू अगर चाहता है वार करूँ मैं पहले

मेरा महबूब ही तकलीफ़ का सामाँ है 'रज़ा'
उस को समझाऊँ या तकरार करूँ मैं पहले

— SALIM RAZA REWA

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