सच का साथ भला कैसे दे पाएगा
एहसानों के बोझ से गर दब जाएगा
जब सच का आईना शोर मचाएगा
शर्म से तू पानी-पानी हो जाएगा
सारी दुनिया में थू-थू हो जाएगी
जिस दिन तेरा झूठ पकड़ में आएगा
मेरे पाँव के छाले मुझ से कहते है
कब तक उस की खोज में चलता जाएगा
उस दिन मेरी तन्हाई जी उट्ठेगी
जिस दिन तू मेरी धड़कन बन जाएगा
जैसा हम बोएँगे वैसा काटेंगे
कर्मों का फल तो हर कोई पाएगा
उस के सारे ग़म धुँदले पड़ जाएँगे
जिस को मुश्किल में जीना आ जाएगा
मुझ को काँटों पर भी चलना आता है
इन रस्तों पर क्या तू भी चल पाएगा
क्यूँ दौलत पे लोग 'रज़ा' इतराते हैं
इक दिन सब कुछ मिट्टी में मिल जाएगा
— SALIM RAZA REWA















