ये दिल बेचैन होता है कलेजा काँप जाता है
वो मंज़र कर्बला का जिस घड़ी भी याद आता है
गले में चुभ गया फ़ौज-ए-लईं का तीर बेकस पे
तड़पता प्यास से मासूम असगर याद आता है
कहीं शमशीर की धारे कहीं पे ख़ूॅं की बौछारें
वो चीख़ों का समाँ रोना तड़पना याद आता है
ये थी ईमान की क़ुव्वत ये दिल में रब की चाहत थी
नबी का लाडला सजदे में अपना सर कटाता है
हुसैन इब्न-ए-अली का ही जिगर था ऐ जहाँ वालों
कोई दुनिया में है जो इस तरह वा'दा निभाता है
ज़माना काँप जाता है 'रज़ा' उस ख़ूनी मंज़र से
जो सुनता दास्तान-ए-कर्बला आँसू बहाता है
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