mere watan men aate hain saare jahaan se log | मेरे वतन में आते हैं सारे जहाँ से लोग


  - SALIM RAZA REWA

मेरे वतन में आते हैं सारे जहाँ से लोग

रहते हैं इस ज़मीन पे अम्न-ओ-अमाँ से लोग


लगता है कुछ ख़ुलूस-ओ-मोहब्बत की है कमी

क्यूँँ उठ के जा रहे हैं तेरे दरमियाँ से लोग



मेरा ख़ुलूस मेरी मोहब्बत को देखकर
जुड़ते गए हैं आ के मेरे कारवाँ से लोग



कैसा है क़हर कैसी तबाही मेरे ख़ुदा
बिछड़े हुए हैं अपनों से अपने मकाँ से लोग



हिन्दी अगर है जिस्म तो उर्दू है उसकी जान 

करते हैं प्यार आज भी दोनों ज़ुबाँ से लोग



नज़्र-ए-फ़साद होता रहा घर मेरा 'रज़ा'
निकले नहीं मुहल्ले में अपने मकाँ से लोग

  - SALIM RAZA REWA

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