रहबर-ए-मदीना का हर सू बोल-बाला है
उन के हाथ कुंजी है उन के हाथ ताला है
रहमतें बरसती हैं हर घड़ी मदीने में
क्या हसीन मंज़र है हर तरफ़ उजाला है
मुझ को क्या सताएँगी ज़ुल्मतें ज़माने की
मेरे सर पे आक़ा की रहमतों का हाला है
जब भी पाँव बहके हैं ज़िंदगी की गर्दिश में
उन के दस्त-ए-रहमत ने बारहा सँभाला है
माँग ले 'रज़ा' तू भी मुस्तफ़ा के सदक़े में
रब ने उन के सदक़े में मुश्किलों को टाला है
— SALIM RAZA REWA















