जब वो क़स
में हमारी खाते हैं
सच यक़ीनन कोई छुपाते हैं
लोग तो लोग हैं सताते हैं
आप क्यूँ दिल मेरा दुखाते हैं
ज़िंदगी की थकन उतार के हम
आओ कुछ देर गुनगुनाते हैं
जब तू आँखों से दूर होता है
कैसे-कैसे ख़याल आते हैं
छोड़ जाएँगे हम तुझे तन्हा
रोज़ कह कर यही डराते हैं
हाल उन का किसी ने पूछा क्या
चोट खाकर जो मुस्कुराते हैं
बचपना आप का गया ही नहीं
आप बच्चों सा रूठ जाते हैं
जिन को चलना सिखाया था मैं ने
अब मुझे नाम से बुलाते हैं
मुझ से नाराज़ हैं 'रज़ा' वो मगर
मेरी ग़ज़लों को गुनगुनाते हैं
— SALIM RAZA REWA















