शर्तों पर ही प्यार करोगे ऐसा क्या
    तुम जीना दुश्वार करोगे ऐसा क्या

    लोगों ने तो ज़ख़्म दिए हैं चुन चुन कर
    तुम भी दिल पर वार करोगे ऐसा क्या

    मुझसे रूठ के खाना पीना छोड़ दिए
    ख़ुद को ही बीमार करोगे ऐसा क्या

    मिलना हो तो मिल जाओ कुछ बात करें
    वादा ही हर बार करोगे ऐसा क्या

    जाने किससे लड़-भिड़ कर तुम आए हो
    अब मुझसे तकरार करोगे ऐसा क्या

    अब मुझको तड़पाने की ख़ातिर तुम भी
    दुश्मन से ही प्यार करोगे ऐसा क्या
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    SALIM RAZA REWA
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    तेरे दीदार से आँखों को सुकूँ मिलता है
    ख़ुद से कर-कर के कई बार बहाने आए
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    आँखों को कुछ सुस्ताने की मोहलत दो
    रस्ता तकते तकते गर थक जाएँ तो

    फिर मैं सजदा करते करते आऊँगा
    अपने दर पर मुझको कभी बुलाएँ तो
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    SALIM RAZA REWA
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    मैं दिन को रात कहूँ वो भी दिन को रात कहे
    यूँ आँख मूँद के वो ऐतिबार करता है
    SALIM RAZA REWA
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    कोई रूठा है अगर उसको मनाना होगा
    भूल कर शिकवे-गिले दिल से लगाना होगा

     
    जिन चराग़ों से ज़माने में उजाला फैले

    उन चराग़ों को हवाओं से बचाना होगा
     

    जिसकी ख़ुशबू से महक जाए ये दुनिया सारी
    फूल गुलशन में कोई ऐसा खिलाना होगा

     
    हर ख़ुशी छोड़ के आ जाऊँगा तेरी ख़ातिर

    शर्त ये है कि मेरा साथ निभाना होगा
     

    दिल के रिश्तों को अगर प्यार से जोड़ा जाए
    एक बंधन में बँधा सारा ज़माना होगा

     
    चाहते हो कि मिटे सब के दिलों से नफ़रत

    दुश्मनों को भी 'रज़ा' दोस्त बनाना होगा
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    SALIM RAZA REWA
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    हम दर-ब-दर की ठोकरें खाते चले गए
    फिर भी तराने प्यार के गाते चले गए

    कोशिश तो की भँवर ने डुबोने की बारहा
    हम कश्ती-ए-हयात बचाते चले गए

    अपना कहा किसी ने गले से लगा लिया
    यूँ दुश्मनों को दोस्त बनाते चले गए

    रुसवाइयों के डर से कभी बज़्म-ए-नाज़ में
    हँस-हँस के दर्द-ए-दिल को छुपाते चले गए

    करता है जो सभी के मुक़द्दर का फ़ैसला
    उसकी रज़ा की शम्अ जलाते चले गए
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    SALIM RAZA REWA
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    जिस तरह से फूलों की डालियाँ महकती हैं
    मेरे घर के आँगन में बेटियाँ महकती हैं

    फूल सा बदन तेरा इस क़दर मोअत्तर है
    ख़्वाब में भी छू लूँ तो उँगलियाँ महकती हैं

    माँ ने जो खिलाई थीं अपने प्यारे हाथों से
    ज़ेहन में अभी तक वो रोटियाँ महकती हैं

    उम्र सारी गुज़री हो जिस की हक़-परस्ती में
    उस की तो क़यामत तक नेकियाँ महकती हैं

    हो गई 'रज़ा' रुख़्सत घर से बेटियाँ लेकिन
    अब तलक निगाहों में डोलियाँ महकती हैं
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    SALIM RAZA REWA
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    कितने अल्फाज़ मचलते हैं सँवरने के लिए
    जब ख़्यालों में कोई  शेर उभर आता है
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    कहीं पर चीख़ होगी और कहीं किलकारियाँ  होंगी
    अगर हाकिम के आगे भूक और लाचारियाँ होंगी

    अगर हर दिल में चाहत हो शराफ़त हो सदाक़त हो
    मोहब्बत का चमन होगा ख़ुशी की क्यारियाँ  होंगी

    किसी को शौक़ यूँ होता नहीं ग़ुरबत में जीने का
    यक़ीनन सामने उसके बड़ी  दुश्वारियाँ  होंगी

    ये होली ईद कहती है भला कब अपने हाथों में
    वफ़ा का रंग  होगा प्यार की पिचकारियाँ होंगी

    सुख़नवर का ये आंगन है यहाँ पर शेर महकेंगें
    ग़ज़ल और गीत नज़्मों की यहाँ फुलवारियाँ होंगी

    अगर जुगनू मुक़ाबिल में है आया आज सूरज के
    यक़ीनन पास उसके भी बड़ी तैयारियाँ  होंगी

    न छोड़ो ये समझ के आग अब ठंडी हुई होगी
    ये मुमकिन है ‘रज़ा’ कुछ राख में चिंगारियाँ होंगी
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    SALIM RAZA REWA
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    मुझ को मेरे ख़यालों के पर काटने पड़े
    उसकी उड़ान थी मेरी औक़ात से सिवा
    SALIM RAZA REWA
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