आँखों को हाए लग गई किस की नज़र निठुर
सोएँ तो नींद लापता रोएँ तो अश्क फुर
तेरे फ़िराक़ में ये मेरा हाल देख कर
करने लगे हैं चाँद सितारे खुसुर-फुसुर
ऐ दिल हिसार-ए-याद से बाहर निकल ज़रा
बच्चों की तरह क्यूँ किए जाता है ना-नुकुर
यूँ ही गुज़रती जाएगी तुम बिन ये ज़िंदगी
यूँ ही तवाफ़ करते रहेंगे माह-ओ-ख़ुर
जैसे कि रू-ब-रू कोई बरसों के बा'द हो
यूँ तक रहा है आइना हम को टुकुर टुकुर
भगवान जाने कैसे निबाहेंगे इस के साथ
हम सादा दिल हैं और ज़माना बड़ा चतुर
अपनी ही धुन में मस्त रहेंगे तमाम उम्र
हम क्यूँ मिलाएँ आप की दुनिया के सुर में सुर
दिल में हज़ार दर्द उठे आँख तर न हो
हम को भी ऐ 'अमीर' सीखा दे ज़रा ये गुर















