हो नहीं पाई कभी पूरी ज़रूरत

लोग करते रह गए रब की इबादत

मुफ़लिसी ने जब निकाला घर से हम को
ठोकरें खाते रहे छोड़ी न ग़ैरत

क्या बता कर क्या बनाया है ख़ुदा ने
हो रही है देख कर अब ख़ुद को हैरत

धमकियाँ अपमान आँसू डाँट ज़िल्लत
कर लिया है ज़ब्त सब तेरी बदौलत

किस के बदले में ख़रीदोगे हमें तुम
जिस्म तो है ही नहीं उल्फ़त की क़ीमत

— Vikas Sahaj

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