जुगनू था और तीरगी में था
यानी मैं अपनी ही कमी में था
गोपियाँ क्यूँँ न होती दीवानी
प्रेम रस उस की बाँसुरी में था
अब वो ख़्वाबों में भी नहीं आता
जो कभी मेरी ज़िंदगी में था
हाए ये दुख कि मैं नहीं था यार
कोई और उस की गैलरी में था
प्यास बुझती न ख़ुदकुशी होती
इतना कम पानी उस नदी में था
वो तसव्वुर में भी न था मेरा
और किसी का वो वाक़ई में था
वो मज़ा यार नौकरी में कहाँ
जो मज़ा यार शायरी में था
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