समय हाथों से निकला जा रहा है
परिंदा वक़्त का समझा रहा है
परिंदा वक़्त का समझा रहा है
मुसाफ़िर की तरह हम सब यहाँ हैं
कोई आया तो कोई जा रहा है
अभी भी वक़्त है यारो सँभलिए
समय अब आईना दिखला रहा है
जहाँ इंसान भी गायब मिलेगा
अभी बस वो ज़माना आ रहा है
जरा सोचो कि ईमाँ जब न होगा
अभी तो आदमी इतरा रहा है
सलीक़े से हमें रहना ही होगा
भले मौसम हमें भटका रहा है
'धरम' अब तो बुराई छोड़ भी दे
जो दानिशमंद है समझा रहा है
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हम ने सलाम अर्ज़ कहा अपने यार से
वो राम-राम कहके गले से लिपट गया
वो राम-राम कहके गले से लिपट गया
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जिस के सीने में मुहब्बत का ख़ज़ाना होगा
ऐसे इंसान की ठोकर में ज़माना होगा।
ऐसे इंसान की ठोकर में ज़माना होगा।
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ऐ चाँद बादलों से निकल आ तो सामने
लेंगे हज़ार मर्तबा बोसे नज़र से हम
लेंगे हज़ार मर्तबा बोसे नज़र से हम
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