Prabhat Adhar

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Prabhat Adhar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Prabhat Adhar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अर्श से कम-कम दिखेगी दुनिया फ़र्श से सब कुछ दिखाई देगा — Prabhat Adhar
वही घर लौट के वापस मिलेगा जो निशाँ अपने ज़मीं पर छोड़ता होगा — Prabhat Adhar
शाइ'र जो मुफ़लिसी में अभी शे'र पढ़ गए तब तक सुना रहे हैं वो जब तक कमा रहे — Prabhat Adhar
वही पत्ता पड़ा होगा अभी पीला कभी बरसात पर जो थूकता होगा — Prabhat Adhar
भीड़ से दब के मरी लाश उठा लेते हैं ये वही लोग हैं आकाश उठा लेते हैं — Prabhat Adhar

Ghazal

सभी शाइ'र अभी शामिल किराए पर सजी है आज की महफ़िल किराए पर मिरी सुन कर मुझे सूली चढ़ा देंगे की हैं मैं ने ग़ज़ल हासिल किराए पर ख़ुशी ये है कि आशिक़ मिल गया लेकिन कसक है ये नहीं है दिल किराए पर मुझे इस मुल्क में नफ़रत बढ़ानी है बनोगे क्या मेरे क़ातिल किराए पर चलीं नदियाँ समुंदर से गले लगने मिला उन को नहीं साहिल किराए पर किसी क़ीमत भी आँखें बेचकर अपनी वो लड़की चाहती है तिल किराए पर झरोखा मिल गया है इक किराए का ख़ुदा दे दे मह-ए-कामिल किराए पर किराया दो तो हिन्दू भी बनूँगा मैं अज़ाँ में भी हुआ शामिल किराए पर मिली है ज़िंदगी वो भी किराए की उसे भी दो कोई बिस्मिल किराए पर — Prabhat Adhar
वो जिस दिलबर को जाना था निकल जाने दिया मैं ने मकीं को एक मेहमाँ में बदल जाने दिया मैं ने उसे मैं जानता था ढील से जाने नहीं वाला जकड़ कर रेत मुट्ठी से फिसल जाने दिया मैं ने यहाँ तो धूप है इतनी मैं करता भी तो क्या करता ज़मीं की प्यास थी सागर निगल जाने दिया मैं ने लगा बीमार की हालत बदलने ही नहीं वाली किया फिर यूँँ कि मौसम ही बदल जाने दिया मैं ने बसें स्कूल के बच्चों का बचपन छीन लेती है नहीं भेजा उसे पैदल निकल जाने दिया मैं ने मुझे बचपन की बैसाखी नहीं बनना था बच्चे की उसे गिरकर मियाँ ख़ुद ही सँभल जाने दिया मैं ने 'अधर' पर आग थी इतनी ग़ज़ल कहता तो क्या कहता हलक़ में आ गया जो हर्फ़ जल जाने दिया मैं ने — Prabhat Adhar
मुझ-सा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है साया मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है चश्मा हटा के आँख से देखा जो आइना चेहरा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है जो देखिए तो ख़ुद-कुशी कितनी अजीब थी जीना मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है भरने को हर्फ़ भर दिए मानी नहीं भरे लिखना मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है आने पे मेरे आप तअज्जुब न कीजिए जाना मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है मंज़िल है इस तरफ़ मुझे जाना है उस तरफ़ रस्ता मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है दरिया के पास रह के भी करता नहीं वुज़ू चश्मा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है अस्मत बचा रहा है वो परवरदिगार की नेता मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है देखा था एक मुल्क सियासत नहीं दिखी सपना मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है मायूस हो गया है अँगूठे से हार कर जूता मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है क्यूँ सज-सँवर के बैठा है राशन बिना रसोई चूल्हा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है जन्नत के बदले उस को मेरी जान चाहिए मौला मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है बोला था उस को फिर कभी आऊँगा लौट कर वा'दा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है माखन चुरा भी सकता है गोपी के वास्ते कान्हा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है देखा मुझे उदास तो शाइ'र कहा गया चर्चा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है कुछ इस लिए 'अधर' हुआ ग़ैरों से वास्ता अपना मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है — Prabhat Adhar
क़सम झूठी मैं खाना चाहता हूँ वफ़ा सच्ची जताना चाहता हूँ तुझे काग़ज़ बनाना चाहता हूँ क़लम अपनी चलाना चाहता हूँ रिवाज-ओ-रस्म से बीमार हूँ मैं दवा उस की कराना चाहता हूँ मुझे ये होंठ अपने काटने है सबब पायल बनाना चाहता हूँ कभी दिल तोड़ कर मैं लड़कियों के नदी उल्टी बहाना चाहता हूँ मरीज़-ए-इश्क़ हूँ मैं विष दवा है सो इस को आज़माना चाहता हूँ अमावस रात की जो रौशनी है नज़र उस सेे मिलाना चाहता हूँ रसोई तेल से ख़ाली पड़ी है दिए घर के बुझाना चाहता हूँ ज़मीं जिस सेे मुझे उस ने निकाला वही पर घर बनाना चाहता हूँ नशे में हूँ बताना मत नशे को ज़रा सा डगमगाना चाहता हूँ यहाँ से देख कर मैं बचपने को घड़ी वापस घुमाना चाहता हूँ — Prabhat Adhar