बात जब तक मेरे ज़बान में हैं
तीर सारे मेरे कमान में हैं
मुफ़्त में अब ख़रीद लाता हूँ
हसरतें जिस किसी दुकान में हैं
बात कुत्तों की ये नहीं सुनते
बच्चे हाथी के किस गुमान में हैं
ग़म मेरे साथ ऐसे रहते हैं
जाले जैसे मेरे मकान में हैं
लोग उतने मरे नहीं हैं अभी
तारे जितने इस आसमान में हैं
— Prabhat Adhar














