किस से पूछिए जा कर क्यूँ बिगड़ गए बच्चे
आतिशीं खिलौनों से खेलने लगे बच्चे
आतिशीं खिलौनों से खेलने लगे बच्चे
कुछ नए तक़ाज़े हैं इस नए ज़माने के
अब कहाँ मचलते हैं चाँद के लिए बच्चे
खो गए तअ'स्सुब के बे-कराँ अँधेरों में
शहर की फ़ज़ाओं में मेरे गाँव के बच्चे
दो-घड़ी लड़ाई है फिर वही सफ़ाई है
हम बड़ों से अच्छे हैं बे-शुऊर से बच्चे
इक क़दम भी फिर आगे मैं न चल सका 'शाहिद'
जब कड़ी मसाफ़त में याद आ गए बच्चे
Read Fullअब कहाँ मचलते हैं चाँद के लिए बच्चे
खो गए तअ'स्सुब के बे-कराँ अँधेरों में
शहर की फ़ज़ाओं में मेरे गाँव के बच्चे
दो-घड़ी लड़ाई है फिर वही सफ़ाई है
हम बड़ों से अच्छे हैं बे-शुऊर से बच्चे
इक क़दम भी फिर आगे मैं न चल सका 'शाहिद'
जब कड़ी मसाफ़त में याद आ गए बच्चे
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गली-कूचों पे ये कैसा सुकूत-ए-मर्ग तारी है
फ़ज़ा-ए-शहर-ए-बे-सौत-ओ-सदा अच्छी नहीं लगती
पस-ए-तस्वीर हो जब एक रंग-ए-आतिश-ओ-आहन
तिरी तस्वीर ऐ दुनिया ज़रा अच्छी नहीं लगती
वही है भूक अहल-ए-ज़र की लेकिन लोग कहते हैं
भरा हो पेट तो कोई ग़िज़ा अच्छी नहीं लगती
तअ'ज्जुब है हमें उन पर जिन्हें अपने गुलिस्ताँ की
ज़मीं अच्छी नहीं लगती फ़ज़ा अच्छी नहीं लगती
अधूरा है अभी ज़ौक़-ए-तमाशा-ए-जमाल अपना
कोई सूरत सर-ए-शहर-ए-वफ़ा अच्छी नहीं लगती
करे क्या चारा-गर ऐसे मरीज़ों का जिन्हें 'शाहिद'
इलाज अच्छा नहीं लगता दवा अच्छी नहीं लगती
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फ़ुर्सत मिले तो देख ज़रा दिल का आइना
इस में है अक्स तेरे गुनाह-ओ-सवाब का
चुप-चाप हाल-ए-अहल-ए-नज़र देखते रहो
है किस के पास वक़्त सवाल-ओ-जवाब का
हर शख़्स घिर गया है नए इज़्तिराब में
तोड़ा है जिस ने क़ुफ़्ल दर-ए-इज़्तिराब का
रखता है तेरे रू-ए-हसीं से मुशाबहत
हर शाख़ पर सजा है जो चेहरा गुलाब का
काफ़ी है उस की ज़ात के इरफ़ान के लिए
मौज-ए-हवा के दोश पे उड़ना सहाब का
'शाहिद' जिन्हें ख़बर है रुमूज़-ए-हयात की
रखते नहीं हिसाब ग़म-ए-बे-हिसाब का
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तुझे है शौक़-ए-बंदगी बहिश्त के ख़याल से
मगर मिरी इबादतें सवाब के लिए नहीं
ये मुझ से एहतिराज़ क्यूँ ये मुझ से इज्तिनाब क्यूँ
सवाल तुझ से है मगर जवाब के लिए नहीं
जनाब क्यूँ उदास हैं जनाब क्यूँ मलूल हैं
ये ग़म तो हैं मिरे लिए जनाब के लिए नहीं
जिसे पसंद आएगा वो तोड़ लेगा शाख़ से
अमान अपने बाग़ में गुलाब के लिए नहीं
जो ग़म उठा चुका है तो उन्हें न अब शुमार कर
ये मुख़्तसर सी ज़िंदगी हिसाब के लिए नहीं
ज़मीं पे 'शाहिद'-ए-हज़ीं हक़ीक़तें तलाश कर
ये दश्त-ए-ज़िंदगी किसी सराब के लिए नहीं
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हर आरज़ू की आँख में आँसू लहू के हैं
किस का ये दिल के शहर में यौम-ए-विसाल है
मुझ को किया था क़ैदी-ए-तक़दीर किस लिए
क़ुदरत से इंतिज़ार-ए-जवाब-ओ-सवाल है
जज़्बों की अंजुमन में उसी की है रौशनी
गुल-हा-ए-आरज़ू में उसी का जमाल है
जो बुख़्ल से किया है इकट्ठा तमाम उम्र
तेरा नहीं है वो तिरे बेटों का माल है
हर गोशा-ए-ज़मीं पे ज़रा ग़ौर से पढ़ो
लिक्खी जो दास्तान-ए-उरूज-ओ-ज़वाल है
'शाहिद' वो पूछते हैं मिरा हाल क्या कहूँ
जैसा था पिछले साल वही अब के साल है
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पहले तो शहर भर में अँधेरा किया गया
फिर हम से रौशनी का तक़ाज़ा किया गया
फिर हम से रौशनी का तक़ाज़ा किया गया
पहले तो साज़िशों से हमें दी गई शिकस्त
फिर ख़ूब इस शिकस्त का चर्चा किया गया
इक शख़्स के लिए मिरी बस्ती का रास्ता
कच्चे मकाँ गिरा के कुशादा किया गया
पहले तो मुझ को राह बताई गई ग़लत
फिर मेरी गुमरही का तमाशा किया गया
दुनिया न थी जो प्यार के क़ाबिल तो किस लिए
हम को असीर-ए-ख़्वाहिश-ए-दुनिया किया गया
इस गुलशन-ए-हयात में रंग-ए-ख़िज़ाँ के साथ
इक मौसम-ए-बहार भी पैदा किया गया
आँखों को आँसुओं के जवाहर दिए गए
दिल के सिपुर्द ग़म का ख़ज़ाना किया गया
दुनिया हमारे क़त्ल को कहती है ख़ुद-कुशी
मरने के बा'द भी हमें रुस्वा किया गया
'शाहिद' लिखा गया था हमारे ही ख़ून से
तसनीफ़ जब वफ़ा का सहीफ़ा किया गया
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वो हम से हो गया है बे-ख़बर कुछ
बदलते मौसमों का है असर कुछ
बदलते मौसमों का है असर कुछ
कहीं साए में रुक कर क्या करेंगे
चलो अब तेज़ बाक़ी है सफ़र कुछ
हवा-ए-तुंद का ये काम देखो
न छोड़ा शाख़ पर बाक़ी समर कुछ
भटकते फिर रहे हैं रास्तों में
बसारत से तही अहल-ए-नज़र कुछ
अगरचे शहर तो अपना है लेकिन
पराए से हैं क्यूँ दीवार-ओ-दर कुछ
अभी दिल में उड़ानों की है ख़्वाहिश
सलामत हैं हमारे बाल-ओ-पर कुछ
अभी 'शाहिद' लुटाओ ग़म की दौलत
अभी हैं आँख में लाल-ओ-गुहर कुछ
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तब्दीलियों की राह पे चलने तो दे मुझे
ख़ुद को बदल रहा हूँ बदलने तो दे मुझे
ख़ुद को बदल रहा हूँ बदलने तो दे मुझे
बच्चा नहीं हूँ मैं जो भटक जाऊँगा कहीं
तन्हा रह-ए-हयात में चलने तो दे मुझे
जलता हुआ चराग़ अगर है मिरा वजूद
फिर अपने दिल के ताक़ में जलने तो दे मुझे
गर मेरी दस्तरस में नहीं आसमाँ का चाँद
महताब-सूरतों से बहलने तो दे मुझे
बन जाऊँगा किरन तिरी सुब्ह-ए-जमाल की
तू अपने रंग रूप में ढलने तो दे मुझे
बार-ए-ग़म-ए-हयात उठा लूँगा और भी
ऐ इंक़िलाब-ए-दहर सँभलने तो दे मुझे
दम तोड़ देंगी ख़ुद ही पुरानी रिवायतें
आईन-ए-मुल्क-ए-शौक़ बदलने तो दे मुझे
मिल जाएगा मुझे भी उजालों का रास्ता
ज़िंदान-ए-तीरगी से निकलने तो दे मुझे
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पढ़ रहा हूँ निसाब हो जैसे
उस का चेहरा किताब हो जैसे
उस का चेहरा किताब हो जैसे
यूँ बसर कर रहा हूँ दुनिया में
ज़िंदगानी अज़ाब हो जैसे
शाख़-ए-क़ामत पे वो हसीं चेहरा
एक ताज़ा गुलाब हो जैसे
यूँ वो रहता है मेरी आँखों में
मेरी आँखों का ख़्वाब हो जैसे
वो मिरे बख़्त के ख़ज़ीने में
गौहर-ए-ला-जवाब हो जैसे
उस की हस्ती किताब-ए-हस्ती का
इक हसीं इंतिसाब हो जैसे
ज़हर-आलाम दिल के साग़र में
इक पुरानी शराब हो जैसे
झूट अब बोलते हैं लोग ऐसे
ये भी कार-ए-सवाब हो जैसे
रेग-ए-दश्त-ए-ख़याल में 'शाहिद'
याद उस की सराब हो जैसे
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हर शख़्स यहाँ मुझ को बीमार सा लगता है
इस शहर में अब जीना आज़ार सा लगता है
इस शहर में अब जीना आज़ार सा लगता है
सोचों की दुकानें हैं यादों के खिलौने हैं
सीने में मिरे कोई बाज़ार सा लगता है
देखा तुम्हें जब से एहसास के आँगन में
हर जज़्बा-ए-ख़्वाबीदा बेदार सा लगता है
अब राह-ए-मोहब्बत में चलना है बहुत मुश्किल
इस राह का हर पत्थर कोहसार सा लगता है
माना कि तिरे लब पर अल्फ़ाज़ तो अच्छे हैं
लेकिन ये तिरा लहजा तलवार सा लगता है
कुछ शहर के दुखड़े हैं कुछ घर के मसाइल हैं
मुझ को ये तिरा ख़त भी अख़बार सा लगता है
हालात ने भर दी है तल्ख़ी सी तबीअत में
अब कार-ए-सुख़न-साज़ी दुश्वार सा लगता है
दर-अस्ल वो कैसा है ये बा'द की बातें हैं
चेहरे से मगर 'शाहिद' ग़म-ख़्वार सा लगता है
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