सर-ए-अश्जार तहरीर हवा अच्छी नहीं लगती

हमें पतझड़ में गुलशन की फ़ज़ा अच्छी नहीं लगती

गली-कूचों पे ये कैसा सुकूत-ए-मर्ग तारी है
फ़ज़ा-ए-शहर-ए-बे-सौत-ओ-सदा अच्छी नहीं लगती

पस-ए-तस्वीर हो जब एक रंग-ए-आतिश-ओ-आहन
तिरी तस्वीर ऐ दुनिया ज़रा अच्छी नहीं लगती

वही है भूक अहल-ए-ज़र की लेकिन लोग कहते हैं
भरा हो पेट तो कोई ग़िज़ा अच्छी नहीं लगती

तअ'ज्जुब है हमें उन पर जिन्हें अपने गुलिस्ताँ की
ज़मीं अच्छी नहीं लगती फ़ज़ा अच्छी नहीं लगती

अधूरा है अभी ज़ौक़-ए-तमाशा-ए-जमाल अपना
कोई सूरत सर-ए-शहर-ए-वफ़ा अच्छी नहीं लगती

करे क्या चारा-गर ऐसे मरीज़ों का जिन्हें 'शाहिद'
इलाज अच्छा नहीं लगता दवा अच्छी नहीं लगती

— Hafeez Shahid

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Gulshan Shayari

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