Hafeez Shahid

Hafeez Shahid

@hafeez-shahid

Hafeez Shahid shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Hafeez Shahid's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
  • Nazm
सर-ए-अश्जार तहरीर हवा अच्छी नहीं लगती
हमें पतझड़ में गुलशन की फ़ज़ा अच्छी नहीं लगती

गली-कूचों पे ये कैसा सुकूत-ए-मर्ग तारी है
फ़ज़ा-ए-शहर-ए-बे-सौत-ओ-सदा अच्छी नहीं लगती

पस-ए-तस्वीर हो जब एक रंग-ए-आतिश-ओ-आहन
तिरी तस्वीर ऐ दुनिया ज़रा अच्छी नहीं लगती

वही है भूक अहल-ए-ज़र की लेकिन लोग कहते हैं
भरा हो पेट तो कोई ग़िज़ा अच्छी नहीं लगती

तअ'ज्जुब है हमें उन पर जिन्हें अपने गुलिस्ताँ की
ज़मीं अच्छी नहीं लगती फ़ज़ा अच्छी नहीं लगती

अधूरा है अभी ज़ौक़-ए-तमाशा-ए-जमाल अपना
कोई सूरत सर-ए-शहर-ए-वफ़ा अच्छी नहीं लगती

करे क्या चारागर ऐसे मरीज़ों का जिन्हें 'शाहिद'
इलाज अच्छा नहीं लगता दवा अच्छी नहीं लगती
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Hafeez Shahid
वो मुझ में था निहाँ मैं देखता क्या
पस-ए-दीवार-ए-जाँ मैं देखता क्या

किताब-ए-ज़िंदगी ज़ेर-ए-नज़र थी
हदीस-ए-दिलबराँ मैं देखता क्या

मुझे चलना था अपने रास्ते पर
निशान-ए-रफ़्तगाँ मैं देखता क्या

नज़र में था वो महताब-ए-तमन्ना
जमाल-ए-कहकशाँ मैं देखता क्या

फ़ना की ज़द पे था बाज़ार-ए-दुनिया
यहाँ सूद-ओ-ज़ियाँ मैं देखता क्या

मिरी आँखें भरी थीं आँसुओं से
सर-ए-शहर-ए-फ़ुग़ाँ मैं देखता क्या

ठिकाना था मिरा दश्त-ए-जुनूँ में
ख़िरद की बस्तियाँ मैं देखता क्या

मिरी मजबूरियाँ भी कम नहीं थीं
तिरी मजबूरियाँ मैं देखता क्या

उसे जब इम्तिहाँ लेना नहीं था
निसाब-ए-इम्तिहाँ मैं देखता क्या

मिरी पर्वाज़ थी 'शाहिद' फ़लक पर
ज़मीं की पस्तियाँ मैं देखता क्या
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Hafeez Shahid
दिल का हर एक दाग़ चराग़ाँ से कम नहीं
मेरी ख़िज़ाँ भी फ़स्ल-ए-बहाराँ से कम नहीं

इस में है ख़ून-ए-दिल का समुंदर छुपा हुआ
आँखों में एक अश्क भी तूफ़ाँ से कम नहीं

यादों में हैं गुलाब से चेहरे सजे हुए
शहर-ए-ख़याल कूचा-ए-जानाँ से कम नहीं

है ख़ाक पर नशिस्त फ़लक पर उड़ान है
मेरी ज़मीं भी तख़्त-ए-सुलैमाँ से कम नहीं

जीने का हौसला भी मयस्सर न हो जिसे
उस की सहर भी शाम-ए-ग़रीबाँ से कम नहीं

निकले किसी की याद में आँसू जो आँख से
मेरे लिए वो ला'ल-ए-बदख़्शाँ से कम नहीं

आँखों के सामने हैं मनाज़िर अजीब से
ये जागना भी ख़्वाब-ए-परेशाँ से कम नहीं

'शाहिद' फ़िराक़-ए-याद में ये दिल का हाल है
वीरानियों में दश्त-ओ-बयाबाँ से कम नहीं
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Hafeez Shahid
क्यूँ क़त्ल के अरमान में आज़ार उठाएँ
गर्दन मिरी हाज़िर है वो तलवार उठाएँ

रोके से मिरी तब-ए-रवाँ रुक न सकेगी
रस्ते में मिरे लाख वो दीवार उठाएँ

जो दिल में तुम्हारे है बता क्यूँ नहीं देते
सदमा जो उठाना है तो यकबार उठाएँ

क्यूँ लोग हैं ख़ामोश ज़बूँ-हाल पे अपने
आवाज़ सर-ए-कूचा-ओ-बाज़ार उठाएँ

ख़ुद ही जो पस-ए-पर्दा-ए-असरार छुपे हैं
वो कैसे भला पर्दा-ए-असरार उठाएँ

नीलाम जो करते हैं यहाँ जिंस-ए-वफ़ा को
मुमकिन ही नहीं नाज़-ए-ख़रीदार उठाएँ

ये जुर्म-ए-मोहब्बत नहीं वाइ'ज़ का मुक़द्दर
ये बार-ए-गुनाह हम से गुनहगार उठाएँ

फिरते हैं जो आज़ाद उन्हें कैसे ख़बर हो
ज़िंदाँ में जो तकलीफ़-ए-गिरफ़्तार उठाएँ

'शाहिद' यही लिक्खा है मुक़द्दर में हमारे
सदमात ज़माने में लगातार उठाएँ
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Hafeez Shahid
इस शहर में निशाना-ए-क़ातिल हमी तो हैं
कुछ जाबिरों की राह में हाइल हमी तो हैं

जो बेचने चले हैं मता-ए-बहार को
उन दुश्मनों के मद्द-ए-मुक़ाबिल हमी तो हैं

गुल-कारी-ए-चमन में हमारा लहू भी है
रंगीनी-ए-बहार में शामिल हमी तो हैं

जो दौलत-ए-हुनर के तलबगार हैं अभी
ऐ रब्ब-ए-हर्फ़-ओ-सौत वसाएल हमी तो हैं

जो खो गए हैं पेच-ओ-ख़म-ए-रहगुज़ार में
उन सब के मुंतज़िर सर-ए-मंज़िल हमी तो हैं

इक उम्र से हैं हल्क़ा-ए-गिर्दाब में घिरे
ना-आश्ना-ए-क़ुर्बत-ए-साहिल हमी तो हैं

हम ही से है ये रौनक़-ए-बज़्म-ए-हयात भी
इस कारोबार-ए-वक़्त का हासिल हमी तो हैं

उस ने अता किया है ग़म-ए-दो-जहाँ हमें
उस की नवाज़िशात के क़ाबिल हमी तो हैं

हम-राहयान-ए-जादा-ए-दुनिया से क्या गिला
'शाहिद' ख़ुद अपनी ज़ात से ग़ाफ़िल हमी तो हैं
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Hafeez Shahid
कठिन हालात में अपने इरादों को जवाँ रखना
हमें आता है दिल में शो'ला-ए-ग़म को निहाँ रखना

अकेले घर में कैसे वक़्त काटोगे तन-ए-तन्हा
कोई तस्वीर लटका कर सर-ए-दीवार-ए-जाँ रखना

हमारी फ़िक्र तुम छोड़ो हमें ये काम आता है
अँधेरों में बसर करना नज़र में कहकशाँ रखना

अजल और ज़िंदगी की दोस्ती इक हर्फ़-ए-बातिल है
बहुत दुश्वार है पानी पे बुनियाद-ए-मकाँ रखना

चमन पर एक दिन फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ का राज भी होगा
अबस है दिल में अरमान-ए-बहार-ए-जावेदाँ रखना

न जाने इस में पोशीदा हैं उस की हिकमतें क्या क्या
हमेशा गर्दिशों में ये ज़मीन-ओ-आसमाँ रखना

कहाँ आसान है अहल-ए-सुख़न की भीड़ में 'शाहिद'
जुदा औरों से अपना तर्ज़-ए-गुफ़्तार-ओ-बयाँ रखना
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Hafeez Shahid
नोच लिए हर शाख़ से पत्ते बूटा बूटा लूट लिया
दस्त-ए-ख़िज़ाँ ने चोरी चोरी बाग़-ए-तमन्ना लूट लिया

उस को ख़ुद ही मैं ने अपने शहर की दौलत सौंपी थी
किस से ज़िक्र करूँ अब जा कर उस ने क्या क्या लूट लिया

और तो कुछ भी पास नहीं था इक यादों की दौलत थी
ज़ालिम वक़्त ने चुपके चुपके ये भी असासा लूट लिया

सूख गई हैं धूप में शाख़ें उम्मीदों अरमानों की
मौसम-ए-ग़म ने दिल के शजर का पत्ता पता लूट लिया

अपने दिल के अरमानों का मेला एक लगाया था
उस ने अपनी छब दिखला कर सारा मेला लूट लिया

हर सू बाम-ओ-दर पर छाए दर्द-ओ-यास के साए हैं
किस ज़ालिम ने इस नगरी का क़र्या क़र्या लूट लिया

तुझ को भी था 'शाहिद'-ए-नादाँ अपने दिल पर नाज़ बहुत
उस ने चोर बन के आख़िर रफ़्ता रफ़्ता लूट लिया
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Hafeez Shahid

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