Malikzada Manzoor Ahmad

Malikzada Manzoor Ahmad

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Malikzada Manzoor Ahmad shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Malikzada Manzoor Ahmad's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

उन्हें ठहरे समुंदर ने डुबोया जिन्हें तूफ़ाँ का अंदाज़ा बहुत था — Malikzada Manzoor Ahmad
अजीब दर्द का रिश्ता है सारी दुनिया में कहीं हो जलता मकाँ अपना घर लगे है मुझे — Malikzada Manzoor Ahmad
देखोगे तो हर मोड़ पे मिल जाएँगी लाशें ढूँडोगे तो इस शहर में क़ातिल न मिलेगा — Malikzada Manzoor Ahmad
अब देख के अपनी सूरत को इक चोट सी दिल पर लगती है गुज़रे हुए लम्हे कहते हैं आईना भी पत्थर होता है — Malikzada Manzoor Ahmad

Ghazal

तर्क-ए-मोहब्बत अपनी ख़ता हो ऐसा भी हो सकता है वो अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो ऐसा भी हो सकता है दरवाज़े पर आहट सुन कर उस की तरफ़ क्यूँ ध्यान गया आने वाली सिर्फ़ हवा हो ऐसा भी हो सकता है हाल-ए-परेशाँ सुन कर मेरा आँख में उस की आँसू हैं मैं ने उस से झूट कहा हो ऐसा भी हो सकता है अर्ज़-ए-तलब पर उस की चुप से ज़ाहिर है इंकार मगर शायद वो कुछ सोच रहा हो ऐसा भी हो सकता है हद्द-ए-नज़र तक सिर्फ़ धुआँ था बर्क़ पे क्यूँ इल्ज़ाम रखें आतिश-ए-गुल से बाग़ जला हो ऐसा भी हो सकता है ख़ून बहाना उस का शेवा है तो सही 'मंज़ूर' मगर हाथ पे उस के रंग-ए-हिना हो ऐसा भी हो सकता है — Malikzada Manzoor Ahmad
चेहरे पे सारे शहर के गर्द-ए-मलाल है जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है उलझन घुटन हिरास तपिश कर्ब इंतिशार वो भीड़ है के साँस भी लेना मुहाल है आवारगी का हक़ है हवाओं को शहर में घर से चराग़ ले के निकलना मुहाल है बे-चेहरगी की भीड़ में गुम है हर इक वजूद आईना पूछता है कहाँ ख़द्द-ओ-ख़ाल है जिन में ये वस्फ़ हो कि छुपा लें हर एक दाग़ उन आइनों की आज बड़ी देख-भाल है परछाइयाँ क़दों से भी आगे निकल गईं सूरज के डूब जाने का अब एहतिमाल है कश्कोल-ए-चश्म ले के फिरो तुम न दर-ब-दर 'मंज़ूर' क़हत-ए-जिंस-ए-वफ़ा का ये साल है — Malikzada Manzoor Ahmad