Mumtaz Gurmani

Mumtaz Gurmani

@mumtaz-gurmani

Mumtaz Gurmani shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Mumtaz Gurmani's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तू ही इक शख़्स है क़िस्से में अलावा मेरे तुझ से भी राज़ छुपाया तो कहाँ खोलूँगा — Mumtaz Gurmani
कूचा-ए-इश्क़ से नाकाम पलटने वाले तू ने देखा था वहाँ मेरी जवानी पड़ी थी — Mumtaz Gurmani
हया से कैसे बदलती है रंगत-ए-रुख़्सार मैं उस को शे'र सुनाता हूँ और देखता हूँ — Mumtaz Gurmani
सुना है मौत मुदावा है ज़ीस्त के ग़म का रुको मैं जान से जाता हूँ और देखता हूँ — Mumtaz Gurmani

Ghazal

अपनी हर बात ज़माने से छुपानी पड़ी थी फिर भी जिस आँख में देखा तो कहानी पड़ी थी मैं ने कुछ रंग चुराए थे किसी तितली के और फिर उम्र हिफ़ाज़त में बितानी पड़ी थी कल किसी इश्क़ के बीमार पे दम करना था पीर-ए-कामिल को ग़ज़ल मेरी सुनानी पड़ी थी कूचा-ए-इश्क़ से नाकाम पलटने वाले तू ने देखा था वहाँ मेरी जवानी पड़ी थी दिल न सह पाया किसी और से क़ुर्बत उस की मुझ को दीवार से तस्वीर हटानी पड़ी थी मैं बहुत जल्द बुढ़ापे में चला आया था बिन तेरे उम्र की रफ़्तार बढ़ानी पड़ी थी उस की हसरत का बदन बर्फ़ न हो जाए कहीं अपने सीने में मुझे आग लगानी पड़ी थी तेरे 'मुमताज़' को ग़म मौत का बस इस लिए है अपने बालों में तुझे ख़ाक रवानी पड़ी थी — Mumtaz Gurmani
मैं कबूतरों को उड़ाता हूँ और देखता हूँ फ़ज़ा का हुस्न बढ़ाता हूँ और देखता हूँ ये आँख मुफ़्त में कुछ भी नहीं दिखाती मुझे मैं इस को ख़्वाब दिखाता हूँ और देखता हूँ सुनाई देता है किस किस को कौन सुनता है गली में शोर मचाता हूँ और देखता हूँ कभी मैं पूछता रहता था कौन है दर पर और अब मैं दौड़ के जाता हूँ और देखता हूँ धमाल डालने आता है रोज़ एक मलंग मैं रोज़ देखने जाता हूँ और देखता हूँ सुना है मौत मुदावा है ज़ीस्त के ग़म का रुको मैं जान से जाता हूँ और देखता हूँ हया से कैसे बदलती है रंगत-ए-रुख़्सार मैं उस को शे'र सुनाता हूँ और देखता हूँ कशिश ज़मीन में ज़्यादा है आसमान में कम हवा में ख़ाक उड़ाता हूँ और देखता हूँ जो शख़्स प्यार का मुनकिर है सामने आए मैं उस से आँख मिलाता हूँ और देखता हूँ — Mumtaz Gurmani