तुम समझते हो कि मैं सिर्फ़ ज़ुबाँ खोलूँगा
बात बाज़ार में रख दूँगा दुकाँ खोलूँगा
फिर तेरी ज़ात पे अंगुश्त-नुमाई होगी
जब मैं लोगों पे कोई और जहाँ खोलूँगा
आज कुछ शहर के बूढों से मिलूँगा जा कर
आज मुद्दत से पड़े बंद मकाँ खोलूँगा
देखना तुंद हवाओं का तज़बज़ुब जब मैं
बादबानों को सर-ए-आब-ए-रवाँ खोलूँगा
मुझ पे तू खोल बिछड़ने के फ़वाइद सारे
तुझ पे मैं हिज्र के सब सूद-ओ-ज़ियाँ खोलूँगा
तू ही इक शख़्स है क़िस्से में अलावा मेरे
तुझ से भी राज़ छुपाया तो कहाँ खोलूँगा
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