Nusrat Siddiqui

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@nusrat-siddiqui

Nusrat Siddiqui shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Nusrat Siddiqui's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

ज़ख़्म भी लगाते हो फूल भी खिलाते हो कितने काम लेते हो एक मुस्कुराने से — Nusrat Siddiqui
किस ज़रूरत को दबाऊँ किसे पूरा कर लूँ अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैं ने — Nusrat Siddiqui
अपने हाथों की लकीरें न बदलने पाई ख़ुश-नसीबों से बहुत हाथ मिलाए मैं ने — Nusrat Siddiqui

Ghazal

फ़ासले न बढ़ जाएँ फ़ासले घटाने से आओ सोच लें पहले राब्ते बढ़ाने से अर्श काँप जाता था एक दिल दुखाने से वो ज़माना अच्छा था आज के ज़माने से ख़्वाहिशें नहीं मरतीं ख़्वाहिशें दबाने से अम्न हो नहीं सकता गोलियाँ चलाने से देख-भाल कर चलना लाज़मी सही लेकिन तजरबे नहीं होते ठोकरें न खाने से एक ज़ुल्म करता है एक ज़ुल्म सहता है आप का तअल्लुक़ है कौन से घराने से कितने ज़ख़्म छिलते हैं कितने फूल खिलते हैं गाह तेरे आने से गाह तेरे जाने से कार-ज़ार-ए-हस्ती में अपना दख़्ल इतना है हंस दिए हँसाने से रो दिए रुलाने से छोटे छोटे शहरों पर क्यूँ न इक्तिफ़ा कर लें खेतियाँ उजड़ती हैं बस्तियाँ बसाने से ज़ख़्म भी लगाते हो फूल भी खिलाते हो कितने काम लेते हो एक मुस्कुराने से और भी सँवरता है और भी निखरता है जल्वा-ए-रुख़-ए-जानाँ देखने दिखाने से जब तलक न टूटे थे ख़ैर-ओ-शर के पैमाने वो ज़माना अच्छा था आज के ज़माने से हर तरफ़ चराग़ाँ हो तब कहीं उजाला हो और हम गुरेज़ाँ हैं इक दिया जलाने से चाँद आसमाँ का हो या ज़मीन का 'नुसरत' कौन बाज़ आता है उँगलियाँ उठाने से — Nusrat Siddiqui
भीड़ है लोगों की हर सू आश्ना कोई नहीं मैं किसे आवाज़ दूँ पहचानता कोई नहीं अन-गिनत पत्ते गिरे पेड़ों से अश्कों की तरह अब की रुत में हादसों की इंतिहा कोई नहीं मेरे दिल में चाँद रौशन मेरी पलकों पर नुजूम मैं ज़मीं पर आसमाँ हूँ जानता कोई नहीं आप के नक़्श-ए-क़दम भी अब नहीं मंज़िल-नुमा लौट जाने का भी अब तो रास्ता कोई नहीं दुश्मनों को भी जो दर्स-ए-दोस्ती देता रहे इस सितमगर दौर में इतना बड़ा कोई नहीं किस क़दर बेगानगी है शह्र-ए-बे-एहसास में आदमी से आदमी का राब्ता कोई नहीं बे-तलब किस के गले में डाल दूँ इस हार को मुझ से मेरी ज़िंदगी भी माँगता कोई नहीं क्या वज़ाहत मैं करूँ क्या लोग होंगे मुतमइन तुझ को मेरी आँख से तो देखता कोई नहीं रात के पिछले पहर 'नुसरत' किसे आवाज़ दूँ सो रहा है शह्र सारा जागता कोई नहीं — Nusrat Siddiqui
ख़याल-ओ-फ़िक्र की सरहद के पार जाते हुए गुरेज़-पा है कोई ख़्वाब में भी आते हुए किसी ने देखा नहीं कौन है निशाने पर किसी ने सोचा नहीं गोलियाँ चलाते हुए गुज़ार दी है इन्हीं कोशिशों में उम्र-ए-अज़ीज़ कभी सहर को कभी शाम को मनाते हुए ये सारे हारने वाले भी मेरे अपने हैं कहीं मैं रो न पड़ूँ तालियाँ बजाते हुए न जाने कौन सा फ़िर्क़ा ख़िलाफ़ हो जाए मैं सहमा रहता हूँ मस्जिद में आते जाते हुए ये फ़र्ज़ भी है ये सुन्नत भी ऐसा लगता है किसी का बार-ए-अलम दोष पर उठाते हुए गुज़रना होता है कठिनाइयों से बाज़-औक़ात अलग से अपना कोई रास्ता बनाते हुए हज़ार बार मुझे सोचना पड़ा 'नुसरत' दिया जलाते हुए और दिया बुझाते हुए — Nusrat Siddiqui