ख़याल-ओ-फ़िक्र की सरहद के पार जाते हुए
गुरेज़-पा है कोई ख़्वाब में भी आते हुए
किसी ने देखा नहीं कौन है निशाने पर
किसी ने सोचा नहीं गोलियाँ चलाते हुए
गुज़ार दी है इन्हीं कोशिशों में उम्र-ए-अज़ीज़
कभी सहर को कभी शाम को मनाते हुए
ये सारे हारने वाले भी मेरे अपने हैं
कहीं मैं रो न पड़ूँ तालियाँ बजाते हुए
न जाने कौनसा फ़िर्क़ा ख़िलाफ़ हो जाए
मैं सहमा रहता हूँ मस्जिद में आते जाते हुए
ये फ़र्ज़ भी है ये सुन्नत भी ऐसा लगता है
किसी का बार-ए-अलम दोष पर उठाते हुए
गुज़रना होता है कठिनाइयों से बाज़-औक़ात
अलग से अपना कोई रास्ता बनाते हुए
हज़ार बार मुझे सोचना पड़ा 'नुसरत'
दिया जलाते हुए और दिया बुझाते हुए
Read Full