आलसी हूँ अपना बोझा ख़ुद उठाने से रहा मैं
पर थी उस को जब ज़रूरत लग के शाने से रहा मैं
बस वही है जो मुझे आँखों से क़ाबू कर सके है
वरना तुम ले आओ दुनिया बस में आने से रहा मैं
मौत से कह दो कि अपनी चाल थोड़ी तेज़ कर ले
ऐसे ही चलती रही तो हाथ आने से रहा मैं
क्या सताया होगा मुझ को पिछले जन्मों में जो अबकी
नौ महीने कोख में छिप कर ज़माने से रहा मैं
— Alankrat Srivastava















