gham-e-hijraan ko rusva kar rahe hain | ग़म-ए-हिज्राँ को रुस्वा कर रहे हैं

  - Mohd Arham

ग़म-ए-हिज्राँ को रुस्वा कर रहे हैं
हम इक दुख और पैदा कर रहे हैं

वो मेरा नाम साहिल से मिटा कर
अलग दरिया से कतरा कर रहे हैं

दिखाता था तमाशा इक मदारी
सो अब बच्चे तमाशा कर रहे हैं

ख़ुदा जाने की उनका क्या बनेगा
जो दरिया से किनारा कर रहे हैं

सुलगती रेत रह रह कह रही है
ये बादल क्यूँ तमाशा कर रहे हैं

भुला के फ़िक्र हम महशर की 'अरहम'
यहाँ बस दुनिया दुनिया कर रहे हैं

  - Mohd Arham

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