तीर लगता अगर निशाने पे
होश आते तिरे ठिकाने पे
क्या कहा फ़र्क़ भी नहीं पड़ता
फ़र्क़ देखेगा मेरे जाने पे
बात उस को समझ में आई तब
इश्क़ में मेरे ज़हर खाने पे
हिज्र की दास्ताँ सुनाती हूँ
क्या ही गुज़री थी उस दिवाने पे
रो पड़ेंगे अगर हुआ ऐसा
वो जनाज़ा मिरा उठाने पे
— Arohi Tripathi















