दुआएँ भी नहीं जाती जहाँ तक

हुए हो दूर तुम मुझ से वहाँ तक

उदासी हम सेफ़र बनकर चली थी
मगर अब पूछ बैठी है , कहाँ तक

अचानक ज़िंदगी रूठेगी हम से
अचानक ही कहेगी बस यहाँ तक

मुसलसल चीख़ता हूँ सोचता हूँ
सदा जाएगी कैसे दो-जहाँ तक

मिरे मुर्शिद इजाज़त दें तो फिर मैं
ज़रा आराम कर लूँ इम्तिहाँ तक

— Shriyansh Qaabiz

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