किया बस इधर से उधर ज़िंदगी भर
भटकते रहे दर-ब-दर ज़िंदगी भर
किसी ने लगाया गले मौत को भी
झुकाया नहीं हमने सर ज़िंदगी भर
गए थे कमाने सभी ख़्वाब रख कर
न आए कभी लौट घर ज़िंदगी भर
ख़ुदा और कितना रहूँ मैं परेशाँ
क़यामत रही हम सेफ़र ज़िंदगी भर
हमें कौन कुछ दे गया है यहाँ पर
कमाकर किया है गुज़र ज़िंदगी भर
मुझे मौत तक मार पाई न लेकिन
किसी ने न छोड़ी क़सर ज़िंदगी भर
किसे हम बताएँ कि इस नौकरी ने
रुलाया हमें इसक़दर ज़िंदगी भर
कहो यार 'कालिख़' कि क्या ही करोगे
मुसलसल करेंगे सफ़र ज़िंदगी भर
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