Saurabh Yadav Kaalikhh

Saurabh Yadav Kaalikhh

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Saurabh Yadav Kaalikhh shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Saurabh Yadav Kaalikhh's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कहो यार 'कालिख़' कि क्या ही करोगे मुसलसल करेंगे सफ़र ज़िंदगी भर — Saurabh Yadav Kaalikhh
थे बहुत शाही से उस के शौक़ मैं क्या बोलता जान को पिस्ता खिलाने में यहाँ पिसता रहा — Saurabh Yadav Kaalikhh
टूट जाता इम्तिहानों से न होकर मुतमइन हूँ बुलंदी पे जो मुर्शिद हौसला मिलता रहा — Saurabh Yadav Kaalikhh
बँटे मुल्क मज़हब के ही वास्ते बहा ख़ूँ सभी का जो मर कट गया — Saurabh Yadav Kaalikhh
तीरगी थी रास्तों में और भटका मैं बहुत रौशनी पाई गुरू से जब कभी गिरता रहा — Saurabh Yadav Kaalikhh
आक़िबत तक आदमी में सिर्फ़ पत्थर रह गया देख कर हैरान हूँ ये लाश डूबी क्यूँँ नहीं — Saurabh Yadav Kaalikhh
मेरी ज़िंदगी में ख़ुशी का ठिकाना नहीं है यहाँ मैं किसी का नहीं कोई मेरा नहीं है — Saurabh Yadav Kaalikhh
रूह सारी सर-ख़ुशी से छोड़ती सारे बदन सोगवारी बेवजह सारी यहाँ घर घर चले — Saurabh Yadav Kaalikhh
ज़ख़्मी से दिन हैं आजकल 'कालिख़' यहाँ तुम याद जाने इस क़दर क्यूँँ आ रहे — Saurabh Yadav Kaalikhh
गुज़रते गुज़रते किसी रोज़ फिर तुम कहोगे कि रहना है घर ज़िंदगी भर — Saurabh Yadav Kaalikhh
लड़े लोग मज़हब बचाने को जब इधर कोई भागा उधर कट गया — Saurabh Yadav Kaalikhh
ज़िंदगी में मोड़ कालिख़ आगे ऐसे आएँगे याद बातें आएँगी बिन ध्यान जो सुनता रहा — Saurabh Yadav Kaalikhh
वो कभी आ कर मुझे छू कर के जाएँ देख कर यूँँ काम कब तक हम चलाएँ — Saurabh Yadav Kaalikhh
रूह सारी सर-ख़ुशी से छोड़ती सारे बदन सोगवारी बेवजह सारी यहाँ घर घर चले — Saurabh Yadav Kaalikhh
याद में मेरी जो शख़्स था याद सा ही मिला है मुझे — Saurabh Yadav Kaalikhh

Ghazal

Nazm

ख़्वाबों की क़ीमत ये हाथों की पैरों की मिटती लकीरें शरीर से बाहर की ओर भागती नसें इन्हें देख कर मन व्यथित हो उठता है देख कर एहसास होता है कि ज़िन्दगी का एक पहलू ऐसा भी है जहाँ सिर्फ़ दो पहर की रोटी कमाकर इंसान सितारों संग सुकून से सोता है ये सुकून दो वक़्त की रोटी कमाकर आता है या फिर अपनी आँखों के ख़्वाबों को बेचकर वो सारे ख़्वाब जो बचपन के वक़्त मासूम आँखों में समा जाते हैं जिन्हें ज़िंदा रख हम तुम ज़िन्दगी गुज़ारते चले जाते हैं ये सोच कर एक और सवाल मेरे ज़ेहन में आ पड़ता है कि किस में ज़्यादा दर्द है ख़्वाबों को मारने में या उन्हें बेचने में किस में ज़्यादा ना-उम्मीदी है कौन इंसान को जीते जी मार देता है आख़िर कौन ख़्वाबों को मार देना या उन्हें बेच देना इन्हीं सवालों में झुलसा हुआ एक सवाल सा झूल रहा हूँ मैं इस झूले में जो उलझी रस्सी के सहारे लटका है और इस झूले से लटका हुआ मैं ज़िन्दगी को परत दर परत खोलने की फ़िराक़ में ज़िंदा हूँ इन्हीं कुछ जाएज़ सवालों के साथ ये हाथों की पैरों की मिटती लकीरों के साथ शरीर से बाहर की ओर भागती नसों के साथ मैं ज़िंदा हूँ — Saurabh Yadav Kaalikhh
"ऐश ट्रे" एक आग ज़माने में लगी हुई है और एक ज़माने भर के लोगों में और एक लगी हुई है इस सिगरेट में जो मेरी उँगलियों के बीच में फँसी हुई है जलने और सुलगने में बहुत फ़र्क़ है ये फ़र्क़ आप को समझ आएगा जब आप किसी जलती हुई लाश के सामने बैठ कर कुछ कश लगाएँगे मेरी सिगरेट सुलग सुलग कर झड़ने के लिए ऐश ट्रे की तरफ़ भागती है इंसान कहाँ भागता है नहीं भाग पाता ना ता'उम्र जलकर झड़ने के वक़्त चार कंधों पर ले जाया जाता है और फूँक दिया जाता है बड़ी आसानी से जैसे मैं ये सिगरेट फूँक रहा हूँ तब्दील हो जाता है राख में मिट्टी में मेरी जलती हुई सिगरेट की तरह हम सब भी क़तार में हैं जैसे क़तार में लगी हुई हैं सिगरेटें डिब्बी में जलकर किसी के होंठों में लग कर सुलगने को बेताब राख होने को बेताब दफ़्न होने को बेताब सिगरेटें हम सिगरेट ही तो हैं और ये दुनिया एक ऐश ट्रे — Saurabh Yadav Kaalikhh
"ज़िंदगी का सफ़र" ज़िंदगी की सड़क पर एक सफ़र पर चला मैं पैदा होते ही बचपन कब छूट गया कुछ पता नहीं चला जैसे जैसे उम्र बढ़ी सड़क भी बड़ी होती गई और बढ़ती गई हमारे तुम्हारे चलने को रफ़्तार भी तेज़ रफ़्तार के चक्कर में कुछ इतना तेज़ चलता गया मैं कि कितने रिश्तों को छोड़ा नातों को छोड़ा अपनों को खोया ना ही लम्हों को पिरोया दिल के क़रीब थी उन सारी अनगिनत बातों को छोड़ा ख़ूब-सूरत रातों को छोड़ा ख़ास मुलाक़ातों को भी बेवकूफों की तरह छोड़ आया मैं अब सड़क के उस मोड़ पर हूँ जहाँ एक बोर्ड लगा हुआ है दो निशान हैं जिस पर एक दाहिने तरफ़ जाने का और दूसरा बाएँ तरफ़ दाहिने तरफ़ का रास्ता जाता है फ़िरदौस की तरफ़ और बाएँ तरफ़ का रास्ता दोजख़ की तरफ़ और आगे सिर्फ़ खाई है लगता है उम्र से भी लंबे सफ़र में था मैं क्योंकि शायद बस भाग ही रहा था मैं सफ़र के अंत में आ कर अब ये तय करना मुश्किल है कि जाऊँ किधर दुनिया ने सिखाया था फ़िरदौस ख़ूब-सूरत है बस दाहिने तरफ़ मुड़ गया मैं और सत्यानाश देखिए कोई बोर्ड उल्टा लगा गया था एक सेकंड को लगा कि काश दुनिया ने ग़लत सिखाया होता तो ग़लती से ही मगर सही जगह पहुँचते मैं सोचता हूँ अब कि उस बोर्ड को देख कर काश मैं पलट गया होता — Saurabh Yadav Kaalikhh
एक दिन एक दिन जब दिल और दिमाग़ आलस के सफ़र में होंगे जब ज़िन्दगी भी थोड़ा आराम फ़रमा रही होगी वो दिन अलग सी छुट्टी का दिन होगा जब पुरानी यादों के रहगुज़र से गुज़रने के बजाए मैं नई यादों के तलाश में होऊँगा कुछ नया करने का जुनून होगा मेरी बाहों के आग़ोश में सिर्फ़ सुकून होगा जब साहिल पर पहाड़ खड़े हुए दिखेंगे और झरने समुंदर में मिलते दिखेंगे मुझे ऐसा एक दिन चाहिए जिस दिन सूरज भी देर तक सफ़र में हो जब चाँद का भी घर जाने का मन न करे जैसे कभी कभी मैं दफ़्तर में देर तक रहता हूँ तारे भी थोड़ा सा ओवरटाइम करें या फिर कोई दिन जो खुले आसमाँ की तरह अपनी बाँहों को खोले मुझे ऐसा एक दिन चाहिए जब मैं अपने दिल में दबी यादों को ज़ख़्मों को ग़मों को बे-रंग आँसुओं में तब्दील कर के ख़ुशी के झरनों में तब्दील कर के किसी समुंदर में घोल दूँ मुझे ऐसा एक दिन चाहिए — Saurabh Yadav Kaalikhh
सब सीमित है यहाँ कोई रिक्त नहीं है सिवाए लाल कोई रक्त नहीं है किसी के पास है थोड़ा ज़्यादा तो कोई बिस्तर पर पड़े सोचता कि वक़्त कम है या वक़्त ही नहीं है सब सीमित है सीमित ज़मीं है सीमित है ये खुला आसमान सीमित इस आसमान तले रह रहे हम इंसान सीमित है आप का मकान भी सीमित आप की मौत का सामान भी सीमित है धड़कन की रफ़्तार भी ये दहर भी ये दयार भी सीमित हैं यहाँ यार भी यारों की बातें मुलाक़ातें दिन का वक़्त हो या ये रातें सीमित हैं ग़म यहाँ ग़म के बा'द की ख़ुशी सीमित सी है रस्सी और उस में पड़ने वाली गाँठ लोगों के अपने नवाबी ठाठ सीमित रिश्ते हैं नहीं दिखते फ़रिश्ते हैं सीमित आप के घर गाड़ी मोबाइल की किश्तें हैं जिन्हें भरने के लिए आप अपने सीमित जीवन में सीमित कमाई के लिए सीमित संख्या में काम करते हैं सीमित है आप का वक़्त भी सीमित हैं ज़िंदगी के पड़ाव हर पड़ाव के दरख़्त भी सीमित है आप की जवानी जिस्म में रवानी ये सारी हवा ये पानी हमारी तुम्हारी वाणी सूरज का उगना डूबना सीमित है डूबता सूरज देख समझ आया उजाला सीमित है और उगता सूरज देख समझ आया कि अँधेरे से सीमित रिश्ता ही स्थिरता की राह है स्थिरता सीमित है सीमित है राह भी ख़ुद की परवाह भी सीमित उम्र है निश्चित मृत्यु है सीमित है आप की काठी सीमित है लकड़ी लाठी सीमित है आप के ताबूत का वज़न सीमित है आप के ऊपर पहनाया गया कफ़न आप के लिए तय हुई दो गज़ भर ज़मीन आप के नीचे बिछी आख़िरी कालीन सीमित है सीमित शब्दों से जितना लिख पाए लिखते गए मुँह उठा कर कहीं से कालिख़ आए पढ़ते गए जितना पढ़ पाए क्योंकि वक़्त बेहद सीमित था सीमित है सीमित रहेगा — Saurabh Yadav Kaalikhh