क़ाबू ज़बान पर तेरा बिल्कुल चले नहीं
बिन डंक के तू डस रहा दिखता भले नहीं
उड़ना तो चाहते हैं परे आसमान के
और चाहते हैं ये भी कि आँधी चले नहीं
अब इस तरह भी कष्ट किसी को न दीजिए
दो हाथ जोड़ने से भी माफ़ी चले नहीं
ग़लती से भी अगर हुआ दिल का किवाड़ बंद
चाबी तो छोड़िए कोई आरी चले नहीं
था ए'तिबार दोस्त तेरे साथ पर बहुत
पर दोस्त साथ में मेरे तुम भी चले नहीं
धोका दिया तो फिर ज़रा तैयार भी रहें
ऐसा नहीं कि लौट के लाठी चले नहीं
— Divya 'Kumar Sahab'















