Divya 'Kumar Sahab'

Divya 'Kumar Sahab'

@Kumar_divya

Divya 'Kumar Sahab' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Divya 'Kumar Sahab''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ध्यान रखना चुप न हो जाए कहीं वो हक़ जता कर जो तुझे समझा रहा है — Divya 'Kumar Sahab'
मन की मन में ही भुनाने में लगे हो हाथ में जो है निकलता जा रहा है — Divya 'Kumar Sahab'
आज़माने में यही ख़तरा रहा है कल जो अपना था कहाँ अपना रहा है — Divya 'Kumar Sahab'
अब जिगर में दर्द है तो दर्द होने दीजिए आप लड़के को बदल कर मर्द होने दीजिए — Divya 'Kumar Sahab'
अच्छा पाने के चक्कर में अपना सच्चा खो देते हैं — Divya 'Kumar Sahab'
यही वो लोग जब माँगो मदद मुँह फेर लेते हैं यही वो हैं जो कहते हैं मदद कोई नहीं करता — Divya 'Kumar Sahab'
बस मोहब्बत बाँटने का ये असर हम पर हुआ वो हमीं हैं जो किसी के भी पसंदीदा नहीं — Divya 'Kumar Sahab'
ज़िंदगी से एक दिन मैं ने कहा था प्यार है ज़िंदगी ने बात मेरी दोस्ती पर रोक दी — Divya 'Kumar Sahab'
मिलाऊँगा उन्हें भी आप सब से सोचता हूँ मैं मगर कब? जब तलक वो आप की भाभी नहीं होती — Divya 'Kumar Sahab'
गोद में मेरी तू अपने सिर को रख कर देखना सिर को सहलाते हुए तुझ को सुनाऊँगा ग़ज़ल — Divya 'Kumar Sahab'
तुम तो कहते थे कि मैं रोता नहीं हूँ कब से इतना मुस्कुराया जा रहा है — Divya 'Kumar Sahab'
मैं भरोसे को बचाने पर तुला हूँ वो बहानों पर उतरता जा रहा है — Divya 'Kumar Sahab'
जगाया है हमें कमबख़्त किस ने बचा था सातवाँ फेरा हमारा — Divya 'Kumar Sahab'
मनेगी इस तरह तुम देखना दीपावली अपनी कहोगे हाथ छोड़ो भी पकौड़े जल रहे हैं जी — Divya 'Kumar Sahab'
जिस दिन भूख कचोटेगी तुम तब जानोगे इक दाने का मतलब क्या क्या हो सकता है — Divya 'Kumar Sahab'
आजकल अपराध झूला हो गया है इस क़दर क़ानून लूला हो गया है — Divya 'Kumar Sahab'
प्यार लुटाने पर मेरा मन हर पल बस ये दोहराता है प्यार लुटाने वाले सारे लोग अकेले रह जाते हैं — Divya 'Kumar Sahab'
ज़रा सा दुख तो होता है परेशानी नहीं होती कोई अब छोड़ जाता है तो हैरानी नहीं होती — Divya 'Kumar Sahab'
हर जगह बिजली गिरा तूफ़ान ला बरसात कर लड़ भले दिन रात मुझ सेे पर मुसलसल बात कर — Divya 'Kumar Sahab'

Ghazal

पत्थर चले तो घाव शजर ने पहन लिए पत्ते तभी से नीम ने कड़वे पहन लिए तैयार था ये रास्ता ठोकर लिए हुए मैं ने भी दोनों पैर में काँटे पहन लिए अपनों को आज़माया तो मुझ को पता चला सब दुश्मनों ने ही यहाँ रिश्ते पहन लिए सबने उतार कर दिया अपना बदन इसे अब तक न जाने आग ने कितने पहन लिए ये खेल है याँ ख़्वाब याँ किरदार है कोई किस के लिए ये रूह ने कपड़े पहन लिए देखी किसी ने थी किसी ने साथ ज़िंदगी पर और किसी ने आँख के सपने पहन लिए कितने तो आए और गए मुझ सेे कहा गया अब तो बता दो आपने कितने पहन लिए मैं ने तो उस सेे कह दिया रह लूँगा बिन तेरे पत्थर ने तैरने के इरादे पहन लिए — Divya 'Kumar Sahab'
तुम मान लो गर मुश्किलों को रास्तों से प्यार हो और आँधियों को भी अगर सारे दियों से प्यार हो मंज़िल तेरे क़दमों में आ कर ख़ुद-ब-ख़ुद गिर जाएगी गर ठोकरें लगती रहें पर हौसलों से प्यार हो सुन हुस्न तेरा देख कर ये लोग तेरे पास हैं कोई तो ऐसा रखले जिस को झुर्रियों से प्यार हो उन के शिकन माथे पे हो याँ दिल में हो याँ हो कहीं सिर चूम कर गजरा लगाकर गेसुओं से प्यार हो सींचा गया है सौ घड़ा फिर भी उगा कुछ भी नहीं इन पेड़-पौधों को भी जैसे मौसमों से प्यार हो नज़दीकियाँ कैसे करोगे मुझ को बतलाओ ज़रा जिन से मोहब्बत हो उन्हें गर फ़ासलों से प्यार हो थी आस इतनी कॉल आता रात के बारह बजे बस जन्मदिन पर एक दिन तो दोस्तों से प्यार हो चौबीस घंटा तुम मोहब्बत गा रहे जिस के लिए तुम जाँचलो उस को कहीं फिर सैकड़ों से प्यार हो बस सूरतों से दौलतों से अब रहा मतलब इन्हें कोई नहीं है अब यहाँ जिस को दिलों से प्यार हो फिर से क़लम शर्मा रही है 'दिव्य' तुम भी देख लो अब हो भी सकता है क़लम को काग़ज़ों से प्यार हो — Divya 'Kumar Sahab'
न जाने क्यूँ लगा वो था कोई अपना मेरे आगे मुझे ऐसा लगा परमात्मा ही था मेरे आगे ज़रा धीमा हुआ और फिर थमा लम्हा मेरे आगे इधर जब वो पहन कर आ गया झुमका मेरे आगे ज़रा देखा मुझे नज़रें मिलाकर मुस्कुराए वो न जाने क्यूँ तभी मचने लगा हल्ला मेरे आगे कभी जो वक़्त से मैं ने कहा बस रुक ही जाना तुम घड़ी ने थाम कर रोका किया पल्ला मेरे आगे हुए टुकड़े घरों के बँट गए हैं चंद पैसों में कहे मुझ सेे बताओ तो हैं अपने क्या मेरे आगे हवाओं ने किया फिर से जुदा उस पेड़ से उस को गिरा वो टूट कर टूटा हुआ पत्ता मेरे आगे न बैठे वो न बोले कुछ मिले और बस लगे जाने तड़प कर फिर से देखो आ गया सपना मेरे आगे क़लम भी 'दिव्य' देखो रख न पाई राज़ अपने तक क़लम कहने लगी सुनता रहा पन्ना मेरे आगे — Divya 'Kumar Sahab'
कहना है इतना आपसे बस ये मुझे गर दिल में रखना हो तभी रखिए मुझे कितने बहाने गोद से सिर ने किए अच्छे नहीं लगते यहाँ तकिए मुझे वो ग़ैर थे जो दे गए माचिस यहाँ पर आग में ले कर गए अपने मुझे ये चाँद सूरज दिख रहे होंगे मगर लगते रहे लटके हुए झुमके मुझे गर मिल गई पतवार तो फिर ठीक है वरना लगेंगे चार बस कंधे मुझे हर ज़िंदगी जो चाहिए थी साथ में पर ख़्वाब में मिलते रहे लम्हे मुझे जब राह तकते आँख मेरी लग गई फिर से जगाने आ गए सपने मुझे इस हौसले से काट डालूँगा इन्हें ये पंख उड़ने ही नहीं देते मुझे जिन को सँभाला हाथ ने वो बुझ गए पर ये हवा देती नहीं बुझने मुझे जो जान थे वो बस मुझे सुनते रहे अनजान जितने थे वही समझे मुझे — Divya 'Kumar Sahab'
तुम्हें क़ीमत पता होती तो बे-क़दरी नहीं होती उन्हें पूछो वो जिन के हिस्से में रोटी नहीं होती ज़रा सा दुख तो होता है परेशानी नहीं होती कोई अब छोड़ जाता है तो हैरानी नहीं होती किया ज़ाहिर कि शादी उन सेे ही करने की ख़्वाहिश है वो हँसती हैं ज़बाँ से पर कभी हाँ-जी नहीं होती मिलाऊँगा उन्हें भी आप सब से सोचता हूँ मैं मगर कब? जब तलक वो आप की भाभी नहीं होती बहन है आप की तो ख़ुश-नसीबी मान कर चलिए उन्हें पूछो वो जिन के हाथ पर राखी नहीं होती हथौड़ा और आरी साथ ले कर चल रहे हैं सब किसी के पास दिल की क्यूँ कोई चाबी नहीं होती सुनामी आ गई कैसे बताओ तो ज़रा आँखों लिखा भी था पलक पर याद तैरानी नहीं होती मोहब्बत है बड़ी ज़ालिम ये आज़ादी नहीं देती सज़ा-ए-मौत पुख़्ता हो भी तो फाँसी नहीं होती लगाए हैं सभी इल्ज़ाम दिल पर 'दिव्य' तुम ने भी बिछड़ जाने की तुम ने भी कभी ठानी नहीं होती — Divya 'Kumar Sahab'
ख़्वाब मेरी बात सुन मंज़र बनाना छोड़ दे अब तो उस की गोद में तू सर बनाना छोड़ दे याद लड़ने के लिए फिर से अकेली आ गई अश्क से जा कर कहो लश्कर बनाना छोड़ दे एक से मन भर गया फिर दूसरा तैयार है जिस्म है बेटे इसे दफ़्तर बनाना छोड़ दे खेल कर फिर तोड़ देता है खिलौने की तरह दिल धड़कता है उसे पत्थर बनाना छोड़ दे बिन कहे इज़हार हो सकता है बस इज़हार कर आँख उस सेे बात कर फ़्यूचर बनाना छोड़ दे इश्क़ थपकी माँगता है काम बारीकी यहाँ है कोई लोहार तो ज़ेवर बनाना छोड़ दे ख़त की कश्ती पर चढ़े अल्फ़ाज़ सब मारे गए सुन ज़रा इंजीनियर पेपर बनाना छोड़ दे इस तरह दिल में बसो वो चहचहाने भी लगे है अगर मकड़ी कोई तो घर बनाना छोड़ दे 'दिव्य' सोशल मीडिया पर बस दिखावा चल रहा ज़िन्दगी है ये इसे पिक्चर बनाना छोड़ दे — Divya 'Kumar Sahab'
राहों में कंकर हैं तो क्या हो सकता है आगे बढ़ कर देखो रिक्शा हो सकता है जितना ख़ुश रहते हैं हम उतना है जीवन सारा जीवन भी इक लम्हा हो सकता है तुम ने क्या क्या बोला है अब तुम ही समझो वो लड़का अंदर से बच्चा हो सकता है रख ली दिल में बातें तब हम ने ये जाना आँखों से लफ़्ज़ों का रस्ता हो सकता है प्यार निभाने से तो सारे दूर हुए हैं नफ़रत कर के शायद रिश्ता हो सकता है सहरा को तो पानी देता है ये सूरज सागर पानी पानी प्यासा हो सकता है दिल ने बोला वो मुझ सेे मिलने आए थे आँखें कहती हैं वो सपना हो सकता है मैं तो उन का ख़ास नहीं पर ये मुमकिन है उन के दिल में मेरा कमरा हो सकता है तेरे हाथो पर हाँ मेरी मेहँदी होगी मेरे सिर पर तेरा सेहरा हो सकता है मरहम ने तो काम किया है ऊपर ऊपर घाव मगर उस सेे भी गहरा हो सकता है जितने बिछड़े हैं और उन में भी ज़िंदा हैं उन का जीना भी तो मरना हो सकता है जिन के पैर नहीं जुरअत करते हैं, कोई दोनों पैरों से भी लँगड़ा हो सकता है तुझ को इक दिन मरना है तो कुछ ऐसे मर तू झंडे में भी तो लिपटा हो सकता है क्या कहते हो दस ओवर में सौ रन पर हैं ध्यान से देखो रोहित शर्मा हो सकता है — Divya 'Kumar Sahab'
ख़्वाब जितने थे सभी अंबर लगा कर आ गए हौसले भी ये तभी फिर पर लगा कर आ गए एक दिन दिल की ज़मीं दो पग में उस ने नाप ली तीसरे पग के लिए हम सर लगाकर आ गए जिस किसी को भी मोहब्बत में ख़ुदा समझा गया वो सभी दिल की जगह पत्थर लगाकर आ गए देख कर और फिर उतर शायद वो मुझ को थाम ले फिर उसी ख़ाली गली चक्कर लगा कर आ गए तोड़ने तो आ गए हो फल इधर पत्थर लिए सोचलो गर पेड़ भी ख़ंजर लगा कर आ गए अब यहाँ उन की है मर्ज़ी थाम लें या छोड़ दें हम तो उन के तट पे ही सागर लगा कर आ गए 'दिव्य' देखो शादियों में बिक रही हैं लड़कियाँ बस उन्हें जो नाम पर अफ़सर लगा कर आ गए — Divya 'Kumar Sahab'
जो फ़र्श के क़ाबिल न था वो अर्श पर समझा गया है वक़्त ऐसा हर दरिंदा मो'तबर समझा गया मैं क्या कहूँ मुझ को यहाँ पर किस क़दर समझा गया समझा नहीं नम आँख को ग़ुस्सा मगर समझा गया पाला जिसे काटा उसे इंसान कहलाये गए और बे-वजह जो कट गया वो जानवर समझा गया कटते गए चिड़ियों के घर सड़कें बनीं और फिर मकाँ जब धूप इनको खा गई तब फिर शजर समझा गया लब नैन ज़ुल्फ़ें नाक चेहरा पार कर भी लो अगर सब सेे बड़ा इन में भँवर उस को कमर समझा गया सबके जतन को ऐब दुनिया उम्रभर कहती रही जिस दिन सफलता मिल गई उस दिन हुनर समझा गया तुम मतलबी दुनिया की बातें 'दिव्य' दिल पर ले गए इन के हुआ मन का तभी तक ईश्वर समझा गया — Divya 'Kumar Sahab'

Nazm

"हिज्र" न जाने कैसे लोग थे वो जो उन के दिल को भा गए मैं ने मोहब्बत चाही तो वो यादें मुझ को थमा गए प्रेम जितना दिल में था ज़बाँ पर आ कर लफ़्ज़ हुआ जब तुम ने उन को सुना नहीं नम बनकर नयन में समा गए दिल में थी एक आस बची तेरी बे-रुख़ी से हार गई वो मोहब्बत थी मेरी जो तुम हँसी में उड़ा गए तुम ने आँखें जो फेरी हैं अब ऐसा शाम सवेरा है सूरज है जैसे बुझा हुआ चँदा तुम जैसे जला गए कानों को थे जो तीर लगे वो दिल पर आ कर ज़ख़्म हुए अब दर्द आँखों में रहता है ये क्या तुम मुझ को सुना गए सागर जो बादल बनकर साहिल से था जुदा हुआ पर्वत ने पूछा हाल ज़रा सारा मंज़र वो बहा गए नींद हटा कर आँखों से ये ख़्वाब तुम्हारे बैठे हैं याद उठी जब आँखों में तो ख़्वाब ये सारे नहा गए बस पैदल ही चल कर के कोई भव-सागर पार हुआ और इस ज़मीं पर डूब कर ये जान कितने गँवा गए अब बस अकेला रहता है और बात तुम्हारी करता है बस खोया सा रहता है क्या तुम दिल को सिखा गए जब साथ तुम्हारा छूटा तो सब ख़्वाब ये मेरे टूटे हैं जब ख़्वाब को पाना चाहा तो सब ज़िम्मेदारी बता गए — Divya 'Kumar Sahab'
"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था — Divya 'Kumar Sahab'
"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं — Divya 'Kumar Sahab'
"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं — Divya 'Kumar Sahab'
मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो। — Divya 'Kumar Sahab'
"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है — Divya 'Kumar Sahab'