आग का दरिया मिला है हाथ को मलते हुए
जब खड़ा मैं हो गया हूँ ख़ुद-ब-ख़ुद जलते हुए
छत पे तुम कपड़े सुखाने ख़ुद कभी आया करो
कह गया मायूस सूरज बस यही ढ़लते हुए
आज रस्सी जो मिली तो बोलती है कुछ-न-कुछ
कुछ-न-कुछ कहता रहा पंखा मुझे चलते हुए
सत्य, निष्ठा, प्रेम और सद्भाव सब मुरझा गए
ज़ुल्म को देखा गया है फूलते-फलते हुए
शब्द मेरे कुछ बताते हैं मेरे हालात पर
आँख ये सब कुछ बताती है मुझे छलते हुए
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