जल चुका इक ख़्वाब पर झिलमिल कहीं पर रह गया
चोट तो वो भर गई चोटिल कहीं पर रह गया
जब पलट कर देखता हूँ वक़्त की इस मार को
जिस्म आगे आ गया है दिल कहीं पर रह गया
बह गई आगे नदी सागर हुई फिर आसमाँ
वो नदी तो बह गई साहिल कहीं पर रह गया
तुम तो उसके हो गए जिसको नहीं थी चाह भी
जो तुम्हारा था सदा क़ाबिल कहीं पर रह गया
आज छप्पन भोग मूरत के लिए फिर आ गया
भूख से बेहाल फिर साइल कहीं पर रह गया
फ़ाएदे नुक़सान पर ही चल रहे हैं लोग जो
खो दिया आसान भी मुश्किल कहीं पर रह गया
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