"क्यूँ है"

तुम नहीं हो यहाँ पर
फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है
कुछ है नहीं मेरे हाथ में
फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है
बड़ी हैरानी है मुझे की
वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है
सबने कहा कि वो तो पराया है
वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है
जितना वो दूर है मुझ से
वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है
बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं
फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है
खुल के नहीं कहती वो कुछ भी
उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं
बसी है दिल में वो मेरे
ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है
उस को नहीं भुला सकता मैं
ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है
पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है
ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है
वो मेरी हुई नहीं है अभी
उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है
दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान
मेरा नसीब मुझ से इतना नाराज़ क्यूँ है
ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे
जो गर ना समझा पाए
तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं
रह तो रहा हूँ अपने निवास में
उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है
गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की
मगर वो साथ नहीं
तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है
सोते ही उस के ख़्वाबों में
और जागते ही उस के ख़यालों में
कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है
जलती हैं ये नज़रें अब मेरी
इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है
हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं
फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन
मुझे इतना विश्वास क्यूँ है
अब भी नहीं समझी क्यूँ है
तुम्हारी बहुत याद आती है
तुम बिन रहा नहीं जाता
बस बात कुछ यों है
तुम से बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी
ये सत्य ज्यूँ का त्यों है
क्यूँ है

— Divya 'Kumar Sahab'

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