"बातें"
मैं और मेरी क़लम
अक्सर बात करते हैं
ये चाँद सूरज क्या लगते हैं
ये दोनों उस की आँखें हैं
तो फिर ये तारे क्या हैं
सब तारे उस की बाली हैं
तो बादल क्या लगते हैं फिर
ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं
तो इंद्रधनुष क्या लगता है
ये इंद्रधनुष है नथ उस की
ये मौसम क्या लगते हैं फिर
सब मौसम उस के नखरे हैं
तो फिर हवा क्या लगती है
हवा तो उस का आँचल है
ये नदियाँ तो फिर रह गईं
ये नदियाँ उस का कंगन हैं
तो फिर समुंदर क्या हुआ
ये समुंदर पायल है उस की
फिर प्रकृति क्या लगती है
ये प्रकृति उस की साड़ी है
ये पूरी धरती रह गई
ये धरती उस की गोद है
इन सब में फिर तुम क्या हो
मुझ को उस का दिल समझ लो
तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ
उस के दिल में फूल समझ लो
उस के दिल में उगता है
उस के दिल में खिलता है
उस
में ही फिर मिलता है
रोज़ सुब्ह से रात तक
देखने मुझ को आता है
साथ वो हर पल चलता है
कंगन पायल खनकाता है
छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो
जल मुझ पर बरसाता है
नथ पहनता है वो ख़ुद
काजल वो मुझे लगाता है
गोद में रख कर सिर मेरा
आँचल से लाड़ लड़ाता है
बात नहीं करता है वो
पर रोज़ मिलने आता है
उस का मेरा जो भी है
बहुत पुराना नाता है
पास वो हर-पल रहता है
पर याद बहुत वो आता है
बस याद बहुत वो आता है
मैं और मेरी क़लम
अक्सर ये बात करते हैं















