"हिज्र"
न जाने कैसे लोग थे वो
जो उन के दिल को भा गए
मैं ने मोहब्बत चाही तो
वो यादें मुझ को थमा गए
प्रेम जितना दिल में था
ज़बाँ पर आ कर लफ़्ज़ हुआ
जब तुम ने उन को सुना नहीं
नम बनकर नयन में समा गए
दिल में थी एक आस बची
तेरी बे-रुख़ी से हार गई
वो मोहब्बत थी मेरी
जो तुम हँसी में उड़ा गए
तुम ने आँखें जो फेरी हैं
अब ऐसा शाम सवेरा है
सूरज है जैसे बुझा हुआ
चँदा तुम जैसे जला गए
कानों को थे जो तीर लगे
वो दिल पर आ कर ज़ख़्म हुए
अब दर्द आँखों में रहता है
ये क्या तुम मुझ को सुना गए
सागर जो बादल बनकर
साहिल से था जुदा हुआ
पर्वत ने पूछा हाल ज़रा
सारा मंज़र वो बहा गए
नींद हटा कर आँखों से
ये ख़्वाब तुम्हारे बैठे हैं
याद उठी जब आँखों में
तो ख़्वाब ये सारे नहा गए
बस पैदल ही चल कर के
कोई भव-सागर पार हुआ
और इस ज़मीं पर डूब कर
ये जान कितने गँवा गए
अब बस अकेला रहता है
और बात तुम्हारी करता है
बस खोया सा रहता है
क्या तुम दिल को सिखा गए
जब साथ तुम्हारा छूटा तो
सब ख़्वाब ये मेरे टूटे हैं
जब ख़्वाब को पाना चाहा
तो सब ज़िम्मेदारी बता गए














