जो फ़र्श के क़ाबिल न था वो अर्श पर समझा गया

है वक़्त ऐसा हर दरिंदा मो'तबर समझा गया

मैं क्या कहूँ मुझ को यहाँ पर किस क़दर समझा गया
समझा नहीं नम आँख को ग़ुस्सा मगर समझा गया

पाला जिसे काटा उसे इंसान कहलाये गए
और बे-वजह जो कट गया वो जानवर समझा गया

कटते गए चिड़ियों के घर सड़कें बनीं और फिर मकाँ
जब धूप इनको खा गई तब फिर शजर समझा गया

लब नैन ज़ुल्फ़ें नाक चेहरा पार कर भी लो अगर
सब से बड़ा इन
में भँवर उस को कमर समझा गया

सबके जतन को ऐब दुनिया उम्रभर कहती रही
जिस दिन सफलता मिल गई उस दिन हुनर समझा गया

तुम मतलबी दुनिया की बातें 'दिव्य' दिल पर ले गए
इन के हुआ मन का तभी तक ईश्वर समझा गया

— Divya 'Kumar Sahab'

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