क्या हार मानने का इरादा है आख़िरी
ये बे-लगाम मन ही तो बाधा है आख़िरी
लहजा तेरा गिरा है तो इक ही जवाब है
अब ख़ामुशी ही लफ़्ज़ हमारा है आख़िरी
दुश्मन का वार जो मेरा कुछ भी न कर सका
सो तीर आस्तीन से आया है आख़िरी
दिल से निभाई दोस्ती तो कर्ज़ चढ़ गया
आघात खा के क़र्ज़ उतारा है आख़िरी
माता पिता की आँख में आँसू अगर भरे
वो हों ख़ुशी के बस यही वादा है आख़िरी
— Divya 'Kumar Sahab'















