ख़्वाब जितने थे सभी अंबर लगा कर आ गए

हौसले भी ये तभी फिर पर लगा कर आ गए

एक दिन दिल की ज़मीं दो पग में उस ने नाप ली
तीसरे पग के लिए हम सर लगाकर आ गए

जिस किसी को भी मोहब्बत में ख़ुदा समझा गया
वो सभी दिल की जगह पत्थर लगाकर आ गए

देख कर और फिर उतर शायद वो मुझ को थाम ले
फिर उसी ख़ाली गली चक्कर लगा कर आ गए

तोड़ने तो आ गए हो फल इधर पत्थर लिए
सोचलो गर पेड़ भी ख़ंजर लगा कर आ गए

अब यहाँ उन की है मर्ज़ी थाम लें या छोड़ दें
हम तो उन के तट पे ही सागर लगा कर आ गए

'दिव्य' देखो शादियों में बिक रही हैं लड़कियाँ
बस उन्हें जो नाम पर अफ़सर लगा कर आ गए

— Divya 'Kumar Sahab'

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