"जज़्बात"

जो ये आँखों से बह रहा है
कितने हम लाचार है
तुम समझो तो इंतिज़ार है
वरना कोई इंतिज़ार नहीं

तुम्हारी याद में ऐसे डूबा
जैसे कोई बीमार है
तुम समझो तो बे-क़रार है
वरना कोई बे-क़रार नहीं

जो मेरी धड़कन चल रही है
इन
में बस तुम्हारा नाम है
तुम समझो तो ये पुकार है
वरना कोई पुकार नहीं

इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं
हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है
तुम समझो तो ये दुलार है
वरना कोई दुलार नहीं

तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं
तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए
तुम समझो तो ये आर-पार है
वरना कुछ आर-पार नहीं

तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ से अच्छा
सामने तुम्हारे तो क़तार है
तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है
बाकी कोई हक़दार नहीं

तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे
सच कहूँ तो दरकार है
तुम समझो तो ये बहार है
वरना कहीं बहार नहीं

तुम्हारी गोद में आराम चाहिए
तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए
तुम समझो तो ये क़रार है
वरना कोई क़रार नहीं

तुम हो जो मेरे जीवन का
तुम नहीं तो सब बेज़ार है
तुम समझो तो ये आधार है
वरना कोई आधार नहीं

काश तुम भी हम से इक़रार करते
चाहत की बरसात मूसला-धार करते
मैं तुम से बेहद करता और तुम
बेहद की भी हद पार करते
तुम समझो तो इन सब के आसार हैं
वरना कोई आसार नहीं

अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता
की तुम हो तो घर-बार है
तुम से ही मेरा संसार है
वरना कोई संसार नहीं

बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी
काट लेंगे तुम्हारे बिना
तुम समझो तो जीने का विचार है
वरना कोई विचार नहीं

ये दुनिया भले कुछ भी बोले
तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना
यही मेरा इज़हार है
अगर तुम समझो तो ये प्यार है
वरना कोई प्यार नहीं

— Divya 'Kumar Sahab'

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