तुम मान लो गर मुश्किलों को रास्तों से प्यार हो
और आँधियों को भी अगर सारे दियों से प्यार हो
मंज़िल तेरे क़दमों में आकर ख़ुद-ब-ख़ुद गिर जाएगी
गर ठोकरें लगती रहें पर हौसलों से प्यार हो
सुन हुस्न तेरा देख कर ये लोग तेरे पास हैं
कोई तो ऐसा रखले जिसको झुर्रियों से प्यार हो
उनके शिकन माथे पे हो याँ दिल में हो याँ हो कहीं
सिर चूम कर गजरा लगाकर गेसुओं से प्यार हो
सींचा गया है सौ घड़ा फिर भी उगा कुछ भी नहीं
इन पेड़-पौधों को भी जैसे मौसमों से प्यार हो
नज़दीकियाँ कैसे करोगे मुझको बतलाओ ज़रा
जिनसे मोहब्बत हो उन्हें गर फ़ासलों से प्यार हो
थी आस इतनी कॉल आता रात के बारह बजे
बस जन्मदिन पर एक दिन तो दोस्तों से प्यार हो
चौबीस घंटा तुम मोहब्बत गा रहे जिसके लिए
तुम जाँचलो उसको कहीं फिर सैकड़ों से प्यार हो
बस सूरतों से दौलतों से अब रहा मतलब इन्हें
कोई नहीं है अब यहाँ जिसको दिलों से प्यार हो
फिर से क़लम शर्मा रही है 'दिव्य' तुम भी देख लो
अब हो भी सकता है क़लम को काग़ज़ों से प्यार हो
As you were reading Shayari by Divya 'Kumar Sahab'
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