ज़ेहन में मेरे एक उदासी बैठी है
थोड़ी नहीं फिर अच्छी ख़ासी बैठी है
सहरा की प्यास देख ली सबने लेकिन
बारिश भी सहरा की प्यासी बैठी है
जिस्म मिलेगा उस से काम चलाना तुम
बन ये रूह किसी की दासी बैठी है
जल्द मरूँगा अब मैं क्योंकि मेरी ही वो
खाकर झूठी क़सम इक्यासी बैठी है
था ख़ासी दिल का ही 'मनोज' पर वो ही
कर के 'मनोज' का दिल क़ासी बैठी है
— Manoj Devdutt















