अब परवरिश में तो कसर रक्खी नहीं
औलाद ने इज़्ज़त मगर रक्खी नहीं
दुनिया जहाँ में घूमते फिरते रहे
अपने घरों की पर ख़बर रक्खी नहीं
जो ज़िन्दगी में करना था वो सब किया
हसरत कोई भी मुख़्तसर रक्खी नहीं
अब काम करती हर दफ़ा उसकी दुआ
माँ ने दुआएँ बे-असर रक्खी नहीं
जो जी किया वो सब किया उसने यहाँ
उसपर ज़रा सी भी नज़र रक्खी नहीं
सब मुफ़्लिसों को ही दिया है आसरा
हमने ज़मीं अपनी खंडर रक्खी नहीं
माँ बाप की पूजा की है मैंने यहाँ
अपनी सिफ़ारिश दर-ब-दर रक्खी नहीं
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