वो काँटा तो दिल से निकल भी गया
दुबारा ये दिल फिर मचल भी गया
दिखाने लगी है मुहब्बत असर
ये पत्थर तो देखो पिघल भी गया
सताता रहा जो मुसलसल मुझे
मिरे साथ ही वो ख़लल भी गया
निशाने पे था तब झुका ही नहीं
अभी तो निशाना बदल भी गया
जफ़ा में भी की उस ने एहसान ही
मिरे ख़्वाब सारे कुचल भी गया
गया वो तो मेरी गई बंदगी
मियाँ सूद छोड़ो असल भी गया
गुज़रते ही वालिद के साहिल मियाँ
जली रस्सी रस्सी का बल भी गया
— sahil















