sahil
sahil
Ghazal

वो काँटा तो दिल से निकल भी गया

दुबारा ये दिल फिर मचल भी गया

दिखाने लगी है मुहब्बत असर
ये पत्थर तो देखो पिघल भी गया

सताता रहा जो मुसलसल मुझे
मिरे साथ ही वो ख़लल भी गया

निशाने पे था तब झुका ही नहीं
अभी तो निशाना बदल भी गया

जफ़ा में भी की उस ने एहसान ही
मिरे ख़्वाब सारे कुचल भी गया

गया वो तो मेरी गई बंदगी
मियाँ सूद छोड़ो असल भी गया

गुज़रते ही वालिद के साहिल मियाँ
जली रस्सी रस्सी का बल भी गया

— sahil

More by sahil

Other ghazal from the same pen

See all from sahil →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling