है बहुत दिलकश मियाँ तस्वीर उस की
प्यार से कम भी नहीं तहक़ीर उस की
वो रहे गंदी निगाहों से सलामत
हो बहुत आबाद अब तक़दीर उस की
झूठ है ये भूल बैठा है वो हम को
है मिली हम को नई तस्तीर उस की
मैं रहूँ बनकर के क़ैदी पास उस के
हो अगर जो हाथ में ज़ंजीर उस की
बात उस से अब नहीं होती है मेरी
हाँ मगर है बोलती तस्वीर उस की
क्या कहें कैसे ग़ज़ल होती है मेरी
है ग़ज़ल से ख़ास अब तहरीर उस की
ज़ख़्म को मिलता है तब आराम 'रौनक'
हो जो मरहम साहिब-ए-तासीर उस की
जान भी दे दूँगा 'रौनक' मैं तो हँस के
इस गले पे हो अगर शमशीर उस की
— Raunak Karn















