तमाम दुनिया में तीरगी है
मगर इक अंदर की रौशनी है
कभी तो लगता है ख़त्म कर दूँ
प जब तू हँस के पुकारती है
तेरा मोहब्बत से हार जाना
मेरी मोहब्बत की हार भी है
तिरे बिना ज़िंदगी ये हमको
कि जैसे खाने को दौड़ती है
तेरे दीवाने का हारना भी
तेरे दीवाने की जीत ही है
मैं तेरा होकर भी तन्हा तन्हा
भटक रहा हूँ ये बेघरी है
तू जिसपे चढ़ के उतर गई थी
वो दिल की कश्ती वहीं खड़ी है
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