ख़ार गुलशन में गुलाबों से अलग रखता हूँ
अपनी आँखों को मैं ख़्वाबों से अलग रखता हूँ
गुल बनाता हूँ वफ़ा लिखता हूँ क़िर्तास पे मैं
रंज-ओ-ग़म दर्द किताबों से अलग रखता हूँ
इसलिए 'इश्क़ के मारों से नहीं बनती मेरी
ख़ुद को मैं ख़ाना-ख़राबों से अलग रखता हूँ
मैं मुअर्रिख़ हूँ नए दौर का इस सोच के साथ
हिज्र को 'इश्क़ के बाबों से अलग रखता हूँ
अपनी बाहों से निकलने नहीं देता हूँ 'शजर'
उसको दुनिया के अज़ाबों से अलग रखता हूँ
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