जादूगर हूँ मैं तुम को भी इक जादू दिखलाऊँगा

जब तुम मुझ में खो जाओगे मैं ग़ायब हो जाऊँगा

मैं ने इस दुनिया में ख़ुद को इतना ज़्यादा खोया है
जब मैं ख़ुद में देखूँगा तब मैं किस किस को पाऊँगा

पत्थर फेंक के सोच रहे हो मेरा रस्ता रोकोगे
पत्थर क्या है मैं दरिया हूँ चीर के पर्वत आऊँगा

जुगनू सूरज दोनों ही जल कर के कुछ बन पाए हैं
मैं भी इन से सीख रहा हूँ सो मैं ख़ुद को जलाऊँगा

राघव ने तो सीता को उस दिन ही जीत लिया था जब
ठान लिया था सागर पर पत्थर का पुल बनवाऊँगा

— Shobhit Dixit

More by Shobhit Dixit

Other ghazal from the same pen

See all from Shobhit Dixit →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling