इक कहानी में पहले सँवारा गया
उस कहानी में फिर मुझ को मारा गया
दर्द भी बाँटते हम किसी से मगर
बीच अपनों के सिर को उतारा गया
आप मन्नत किए टूटते देख कर
है मिरा दुख किसी घर का तारा गया
घर को सहरा समझते रहे उन दिनों
गाँव छूटा लगा वक़्त प्यारा गया
जुगनू ले कर भटकते रहे दर-ब-दर
शम्स की खोज में चाँद तारा गया
एक मोती मगर हाथ आया नहीं
हाथ से भी निकल अब किनारा गया
— Shubham Rai 'shubh'















