समुंदर कितना गहरा देखना है
उसे अब कह के दरिया देखना है
गया था पेड़ से ख़ुद टूट कर जो
कहाँ पहुँचा वो पत्ता देखना है
यूँ चीख़ूँगा भले आवाज़ जाए
ज़माना कितना बहरा देखना है
हज़ारों में या लाखों में बिकेगा
है ईमाँ कितना महँगा देखना है
रहा जो सिर्फ़ मेरा ज़िंदगी भर
रहा उस का मैं कितना देखना है
बिछड़ने का सबब पढ़ना है मुझ को
तेरा इक बार चेहरा देखना है
पुकारूँगा मगर आना नहीं तुम
मुझे ता-उम्र रस्ता देखना है
— Aatish Indori















