ग़म-ज़दा आँखों का पानी
बोलता है बे-ज़बानी
मार ही डालेगी हम को
आज उन की सरगिरानी
आप की हर बात वाजिब
और हमारी लंतरानी
जाने किस की बद-दुआ है
वक़्त-ए-गर्दिश जाँ-सितानी
दर्द-ओ-ग़म रास आ रहे हैं
बुझ रही है ज़िंदगानी
कौन जाने कब कहाँ से
आए मर्ग-ए-ना-गहानी
ले के फागुन आ गया फिर
फ़स्ल-ए-गुल की छेड़खानी
कैसे मैं समझाऊँ ख़ुद को
संग दिल है मेरा जानी
बोलते हैं चोर अक्सर
शाह ख़ुद को ख़ानदानी
कौन जाने रूह क्या है
फ़ानी है या जावेदानी
मुफ़्लिसी को देखा सोते
ओढ़कर रंग आसमानी
— Ajeetendra Aazi Tamaam















